भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चिरकालतक तपस्या करनेके कारण क्षीण शरीरवाली देवी स्वाहाके अभिप्रायको वे सर्वज्ञ प्रभु समझ गये। उन्होंने उन्हें उठाकर अपने अङ्कमें बैठा लिया और कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— कान्ते! तुम वाराहकल्पमें अपने अंशसे मेरी प्रिया बनोगी। तुम्हारा नाम 'नाग्नजिती' होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्तिके रूपमें अग्निकी प्रिय पत्नी बनो। मेरे प्रसादसे तुम मन्त्रोंकी अङ्गभूता एवं परम पवित्र होओगी। अग्निदेव तुम्हें अपनी गृहस्वामिनी बनाकर भक्ति-भावके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम परम रमणीया देवीके साथ वे सानन्द विहार करेंगे।

नारद! देवी स्वाहासे इस प्रकार सम्भाषण करके उन्हें आश्वासन दे भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये। फिर ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार डरते हुए अग्निदेव वहाँ आये और सामवेदमें कही हुई विधिसे जगज्जननी भगवतीका ध्यान करके उन्होंने देवीकी भलीभाँति पूजा और स्तुति की। तत्पश्चात् अग्निदेवने मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्वाहादेवीका पाणिग्रहण किया। देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक वे उनके साथ आनन्द करते रहे। परम सुखप्रद निर्जन देशमें रहते समय देवी स्वाहा अग्निदेवके तेजसे गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं, तत्पश्चात् दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्निके क्रमसे उनके मनको मुग्ध करनेवाले परम सुन्दर तीन पुत्र उनसे उत्पन्न हुए। तब ऋषि, मुनि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय आदि सभी श्रेष्ठ वर्ण 'स्वाहान्त' मन्त्रोंका उच्चारण करके अग्निमें हवन करने लगे और देवताओंको वह आहाररूपसे प्राप्त होने लगा। जो पुरुष स्वाहायुक्त प्रशस्त मन्त्रका उच्चारण करता है, उसे केवल मन्त्र पढ़नेमात्रसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार विषहीन सर्प, वेदहीन ब्राह्मण, पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्याहीन पुरुष तथा फल एवं शाखाहीन वृक्ष निन्दाके पात्र हैं, वैसे ही स्वाहाहीन मन्त्र भी निन्द्य है। ऐसे मन्त्रसे किया हुआ हवन शीघ्र फल नहीं देता। फिर तो सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गये। देवताओंको आहुतियाँ मिलने लगीं। स्वाहान्त मन्त्रसे ही उनके सारे कर्म सफल होने लगे। मुने! भगवती स्वाहासे सम्बन्ध रखनेवाला इस प्रकार यह सारा श्रेष्ठ उपाख्यान कह सुनाया। यह सारभूत प्रसङ्ग सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा— प्रभो! मुनीश्वर! अब मुझे भगवती स्वाहाकी पूजाका वह विधान, ध्यान एवं स्तोत्र बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे अग्निदेवने उनकी पूजा करके स्तुति की थी।

भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! मुनिवर! भगवती स्वाहाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाका जो विधान सामवेदमें कहा गया है, वही मैं तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। पुरुषको चाहिये कि फल प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भमें शालग्रामकी प्रतिमामें अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका पूजन करके यज्ञ आरम्भ करे। ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—'देवी स्वाहा मन्त्रोंकी अङ्गभूता होनेसे परम पवित्र हैं। ये मन्त्रसिद्धिरूपिणी हैं। सिद्ध एवं सिद्धिदायिनी हैं तथा मनुष्योंको उनके सम्पूर्ण कर्मोंका फल

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