ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २५७
भगवती मङ्गलचण्डी और मनसादेवीका उपाख्यान
भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मपुत्र नारद! आगम शास्त्रके अनुसार षष्ठीदेवीका चरित्र कह दिया। अब भगवती मङ्गलचण्डीका उपाख्यान सुनो, साथ ही उनकी पूजाका विधान भी। इसे मैंने धर्मदेवके मुखसे सुना था, वही बता रहा हूँ। यह श्रुतिसम्मत उपाख्यान सम्पूर्ण विद्वानोंको भी अभीष्ट है। 'चण्डी' शब्दका प्रयोग 'दक्षा' (चतुरा)-के अर्थमें होता है और 'मङ्गल' शब्द कल्याणका वाचक है। जो मङ्गल—कल्याण करनेमें दक्ष हो, वह 'मङ्गलचण्डिका' कही जाती है। 'दुर्गा' के अर्थमें चण्डी शब्दका प्रयोग होता है और मङ्गल शब्द भूमिपुत्र मङ्गलके अर्थमें भी आता है। अतः जो मङ्गलकी अभीष्ट देवी हैं, उन देवीको 'मङ्गलचण्डिका' कहा गया है। मनुवंशमें मङ्गल नामक एक राजा थे। सप्तद्वीपवती पृथ्वी उनके शासनमें थी। उन्होंने इन देवीको अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिये भी ये 'मङ्गलचण्डी' नामसे विख्यात हुईं। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी 'दुर्गा' कहलाती हैं, उन्हींका यह रूपान्तर है। ये देवी कृपाकी मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियोंकी ये इष्टदेवी हैं।
सर्वप्रथम भगवान् शंकरने इन सर्वश्रेष्ठरूपा देवीकी आराधना की। ब्रह्मन्! त्रिपुर नामक दैत्यके भयंकर वधके समयका यह प्रसङ्ग है। भगवान् शंकर बड़े संकटमें पड़ गये थे। दैत्यने रोषमें आकर उनके वाहन विमानको आकाशसे नीचे गिरा दिया था। तब ब्रह्मा और विष्णुने उन्हें प्रेरणा की। उन महानुभावोंका उपदेश मानकर शंकर भगवती दुर्गाकी स्तुति करने लगे। वे भी देवी मङ्गलचण्डी ही थीं। केवल रूप बदल लिया था। स्तुति करनेपर वे ही देवी भगवान् शंकरके सामने प्रकट हुईं और उनसे बोलीं—
'प्रभो! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। स्वयं सर्वेश भगवान् श्रीहरि ही वृषभका रूप धारण करके तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे। वृषध्वज! मैं युद्ध-शक्तिस्वरूपा बनकर तुम्हारा साथ दूँगी। फिर स्वयं मेरी तथा श्रीहरिकी सहायतासे तुम देवताओंको पदच्युत करनेवाले उस दानवको, जिसने घोर शत्रुता ठान रखी है, मार डालोगे।'
मुनिवर! इस प्रकार कहकर भगवती अन्तर्धान हो गयीं। उसी क्षण उन शक्तिरूपी देवीसे शंकर सम्पन्न हो गये। भगवान् श्रीहरिने एक अस्त्र दे दिया था। अब उसी अस्त्रसे त्रिपुर-वधमें उन्हें सफलता प्राप्त हो गयी। दैत्यके मारे जानेपर सम्पूर्ण देवताओं तथा महर्षियोंने भगवान् शंकरका स्तवन किया। उस समय सभी भक्तिमें सराबोर होकर अत्यन्त नम्र हो गये थे। उसी क्षण भगवान् शंकरके मस्तकपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्मा और विष्णुने परम संतुष्ट होकर उन्हें शुभ आशीर्वाद और सदुपदेश भी दिया। तब भगवान् शंकर सम्यक् प्रकारसे स्नान करके भक्तिके साथ भगवती मङ्गलचण्डीकी आराधना करने लगे। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, विविध वस्त्र, पुष्प, चन्दन, भाँति-भाँतिके नैवेद्य, बलि, वस्त्र, अलंकार, माला, तीर, पिष्टक, मधु, सुधा तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा भक्तिपूर्वक उन्होंने देवीकी पूजा की। नाच, गान, वाद्य और नाम-कीर्तन भी कराया। तत्पश्चात् माध्यन्दिन शाखामें कहे हुए ध्यान-मन्त्रके द्वारा भगवती मङ्गलचण्डीका भक्तिपूर्वक ध्यान किया। नारद! उन्होंने मूलमन्त्रका उच्चारण करके ही भगवतीको सभी द्रव्य समर्पण किये थे। वह मन्त्र इस प्रकार है—
'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके ऐं क्रूं फट् स्वाहा।'*
* देवीभागवत नवम स्कन्धके ४७वें अध्यायमें भी यह मन्त्र आया है, वहाँ 'ऐं क्रूं' के स्थानमें 'हूं हूं' ऐसा पाठ है।