ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २५८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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—इक्कीस अक्षरका यह मन्त्र सुपूजित होनेपर भक्तोंको सम्पूर्ण कामना प्रदान करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरूप है। दस लाख जप करनेपर इस मन्त्रकी सिद्धि होती है।
ब्रह्मन्! अब ध्यान सुनो। सर्वसम्मत ध्यान वेदप्रणीत है। 'सुस्थिरयौवना भगवती मङ्गलचण्डिका सदा सोलह वर्षकी ही जान पड़ती हैं। ये सम्पूर्ण रूप-गुणसे सम्पन्न, कोमलाङ्गी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पाके समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। ये अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। मल्लिका-पुष्पोंसे समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्कालके प्रफुल्ल कमलकी भाँति शोभायमान मुखवाली मङ्गलचण्डिकाके प्रसन्न वदनारविन्दपर मन्द मुसकानकी छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमलके समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करनेवाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागरसे उबारनेमें जहाजका काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।' मुने! यह तो भगवती मङ्गलचण्डिकाका ध्यान हुआ। ऐसे ही स्तवन भी है, सुनो।
महादेवजीने कहा—जगन्माता भगवती मङ्गलचण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियोंका विध्वंस करनेवाली हो एवं हर्ष तथा मङ्गल प्रदान करनेको सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और मङ्गल देनेवाली हर्षमङ्गलचण्डिके! तुम शुभा, मङ्गलदक्षा, शुभमङ्गलचण्डिका, मङ्गला, मङ्गलार्हा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला कहलाती हो। देवि! साधुपुरुषोंको मङ्गल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम सबके लिये मङ्गलका आश्रय हो। देवि! तुम मङ्गलग्रहकी इष्टदेवी हो। मङ्गलके दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिये। मनुवंशमें उत्पन्न राजा मङ्गलकी पूजनीया देवी हो। मङ्गलाधिष्ठात्री देवि! तुम मङ्गलोंके लिये भी मङ्गल हो। जगत्के समस्त मङ्गल तुमपर आश्रित हैं। तुम सबको मोक्षमय मङ्गल प्रदान करती हो। मङ्गलको सुपूजित होनेपर मङ्गलमय सुख प्रदान करनेवाली देवि! तुम संसारकी सारभूता मङ्गलाधारा तथा समस्त कर्मोंसे परे हो।'
इस स्तोत्रसे स्तुति करके भगवान् शंकरने देवी मङ्गलचण्डिकाकी उपासना की। वे प्रति मङ्गलवारको उनका पूजन करके चले जाते हैं। यों ये भगवती सर्वमङ्गला सर्वप्रथम भगवान् शंकरसे पूजित हुईं। उनके दूसरे उपासक मङ्गल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मङ्गलने तथा चौथी बार मङ्गलके दिन कुछ सुन्दरी स्त्रियोंने इन देवीकी पूजा की। पाँचवीं बार मङ्गलकी कामना रखनेवाले बहुसंख्यक मनुष्योंने मङ्गलचण्डिकाका पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकरसे सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्वमें सदा पूजित होने लगीं। मुने! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव—सभी सर्वत्र इन परमेश्वरीकी पूजा करने लगे।
जो पुरुष मनको एकाग्र करके भगवती मङ्गलचण्डिकाके इस मङ्गलमय स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे सदा मङ्गल प्राप्त होता है। अमङ्गल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रोंमें वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मङ्गल ही दृष्टिगोचर होता है।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! आगमोंके अनुसार देवी षष्ठी और मङ्गलचण्डिकाका उपाख्यान कह चुका। अब मनसादेवीका चरित्र, जो धर्मके मुखसे मैं सुन चुका हूँ, तुमसे कहता हूँ, सुनो। ये भगवती कश्यपजीकी मानसी कन्या हैं तथा मनसे उद्दीप्त होती हैं, इसलिये 'मनसा' देवीके नामसे विख्यात हैं। आत्मामें रमण करनेवाली इन सिद्धयोगिनी वैष्णवीदेवीने तीन युगोंतक परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या की है।