ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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एवं सर्वेश्वर हैं, वेद जिनका स्वरूप है, जो वेदोंके बीज, वेदोक्त फलके दाता और फलरूप हैं, वेदोंके ज्ञाता, उसके विधानको जाननेवाले तथा सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंके शिरोमणि हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।*
ऐसा कहकर वे नारायणदेव भक्तिभावसे युक्त हो उनकी आज्ञासे उन परमात्माके सामने रमणीय रत्नमय सिंहासनपर विराज गये। जो पुरुष प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो तीनों संध्याओंके समय नारायणद्वारा किये गये इस स्तोत्रको सुनता और पढ़ता है, वह निष्पाप हो जाता है। उसे यदि पुत्रकी इच्छा हो तो पुत्र मिलता है और भार्याकी इच्छा हो तो प्यारी भार्या प्राप्त होती है। जो अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया है, वह इस स्तोत्रके पाठसे पुनः राज्य प्राप्त कर लेता है तथा धनसे वञ्चित हुए पुरुषको धनकी प्राप्ति हो जाती है। कारागारके भीतर विपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य यदि इस स्तोत्रका पाठ करे तो निश्चय ही संकटसे मुक्त हो जाता है। एक वर्षतक इसका संयमपूर्वक श्रवण करनेसे रोगी अपने रोगसे छुटकारा पा जाता है।
**सौति कहते हैं—**शौनकजी! तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे भगवान् शिव प्रकट हुए। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल एवं उज्ज्वल थी। उनके पाँच मुख थे और दिशाएँ ही उनके लिये वस्त्र थीं। उन्होंने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पीले रंगकी जटाओंका भार धारण कर रखा था। उनका मुख मन्द-मन्द मुसकानसे प्रसन्न दिखायी देता था। उनके प्रत्येक मस्तकमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके सिरपर चन्द्राकार मुकुट शोभा पाता था। परमेश्वर शिवने हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश और जपमाला ले रखी थी। वे सिद्ध तो हैं ही, सम्पूर्ण सिद्धोंके ईश्वर भी हैं। योगियोंके गुरुके भी गुरु हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं, मृत्युके ईश्वर हैं, मृत्युस्वरूप हैं और मृत्युपर विजय पानेवाले मृत्युञ्जय हैं। वे ज्ञानानन्दस्वरूप, महाज्ञानी, महान् ज्ञानदाता तथा सबसे श्रेष्ठ हैं। पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभासे धुले हुए-से गौरवर्ण शिवका दर्शन सुखपूर्वक होता है। उनकी आकृति मनको मोह लेती है। ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान भगवान् शिव वैष्णवोंके शिरोमणि हैं। प्रकट होनेके पश्चात् श्रीकृष्णके सामने खड़े हो भगवान् शिवने भी हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे और उनकी वाणी अत्यन्त गद्गद हो रही थी।
**महादेवजी बोले—**जो जयके मूर्तिमान् रूप, जय देनेवाले, जय देनेमें समर्थ, जयकी प्राप्तिके कारण तथा विजयदाताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, उन अपराजित देवता भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो विश्वके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, विश्वेश्वर, विश्वकारण, विश्वाधार, विश्वके विश्वासभाजन तथा विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जो जगत्की रक्षाके कारण, जगत्के संहारक तथा जगत्की सृष्टि करनेवाले परमेश्वर हैं; फलके बीज, फलके आधार, फलरूप और फलदाता
* वरं वरेण्यं वरदं वराहं वरकारणम्। कारणं कारणानां च कर्म तत्कर्मकारणम्॥
तपस्तत्फलदं शश्वत् तपस्विनां च तापसम्। वन्दे नवघनश्यामं स्वात्मारामं मनोहरम्॥
निष्कामं कामरूपं च कामघ्नं कामकारणम्। सर्वं सर्वेश्वरं सर्वबीजरूपमनुत्तमम्॥
वेदरूपं वेदबीजं वेदोक्तफलदं फलम्। वेदज्ञं तद्विधानं च सर्ववेदविदां वरम्॥
(ब्रह्मखण्ड ३। १०–१३)