ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड २९
हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेजःस्वरूप, तेजके दाता और सम्पूर्ण तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ।*
ऐसा कहकर महादेवजीने भगवान् श्रीकृष्णको मस्तक झुकाया और उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर नारायणके साथ वार्तालाप करते हुए बैठ गये। जो मनुष्य भगवान् शिवद्वारा किये गये इस स्तोत्रका संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ मिल जाती हैं और पग-पगपर विजय प्राप्त होती है। उसके मित्र, धन और ऐश्वर्यकी सदा वृद्धि होती है तथा शत्रुसमूह, दुःख और पाप नष्ट हो जाते हैं।
**सौति कहते हैं—**तत्पश्चात् श्रीकृष्णके नाभि-कमलसे बड़े-बूढ़े महातपस्वी ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने अपने हाथमें कमण्डलु ले रखा था। उनके वस्त्र, दाँत और केश सभी सफेद थे। चार मुख थे। वे ब्रह्माजी योगियोंके ईश्वर, शिल्पियोंके स्वामी तथा सबके जन्मदाता गुरु हैं। तपस्याके फल देनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके जन्मदाता हैं। वे ही स्रष्टा और विधाता हैं तथा समस्त कर्मोंके कर्ता, भर्ता एवं संहर्ता हैं। चारों वेदोंको वे ही धारण करते हैं। वे वेदोंके ज्ञाता, वेदोंको प्रकट करनेवाले और उनके पति (पालक) हैं। उनका शील-स्वभाव सुन्दर है। वे सरस्वतीके कान्त, शान्तचित्त और कृपाकी निधि हैं। उन्होंने श्रीकृष्णके सामने खड़े हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था तथा उनकी ग्रीवा भगवान्के सामने भक्तिभावसे झुकी हुई थी।
**ब्रह्माजी बोले—**जो तीनों गुणोंसे अतीत और एकमात्र अविनाशी परमेश्वर हैं, जिनमें कभी कोई विकार नहीं होता, जो अव्यक्त और व्यक्तरूप हैं तथा गोप-वेष धारण करते हैं, उन गोविन्द श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनकी नित्य किशोरावस्था है, जो सदा शान्त रहते हैं, जिनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है तथा जो नूतन जलधरके समान श्यामवर्ण हैं, उन परम मनोहर गोपीवल्लभको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वृन्दावनके भीतर रासमण्डलमें विराजमान होते हैं, रासलीलामें जिनका निवास है तथा जो रासजनित उल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं, उन रासेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ।†
ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे नारायण तथा महादेवजीके साथ सम्भाषण करते हुए श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठे। जो प्रातःकाल उठकर ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और बुरे सपने अच्छे सपनोंमें बदल जाते हैं। भगवान् गोविन्दमें भक्ति होती है, जो पुत्रों और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाली है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे अपयश नष्ट होता है और चिरकालतक सुयश बढ़ता रहता है।
* जयस्वरूपं जयदं जयेशं जयकारणम्। प्रवरं जयदानां च वन्दे तमपराजितम्॥
विश्वं विश्वेश्वरेशं च विश्वेशं विश्वकारणम्। विश्वाधारं च विश्वस्तं विश्वकारणकारणम्॥
विश्वरक्षाकारणं च विश्वघ्नं विश्वजं परम्। फलबीजं फलाधारं फलं च तत्फलप्रदम्॥
तेजःस्वरूपं तेजोजं सर्वतेजस्विनां वरम्। (ब्रह्मखण्ड ३। २४-२५ १/२)
† कृष्णं वन्दे गुणातीतं गोविन्दमेकमक्षरम्। अव्यक्तमव्ययं व्यक्तं गोपवेषविधायिनम्॥
किशोरवयसं शान्तं गोपीकान्तं मनोहरम्। नवीननीरदश्यामं कोटिकन्दर्पसुन्दरम्॥
वृन्दावनवनाभ्यर्णे रासमण्डलसंस्थितम्। रासेश्वरं रासवासं रासोल्लाससमुत्सुकम्॥
(ब्रह्मखण्ड ३। ३५-३७)