भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सौति कहते हैं—तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलसे कोई एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसकी अङ्गकान्ति श्वेत वर्णकी थी और उसने अपने मस्तकपर जटा धारण कर रखी थी। वह सबका साक्षी, सर्वज्ञ तथा सबके समस्त कर्मोंका द्रष्टा था। उसका सर्वत्र समभाव था। उसके हृदयमें सबके प्रति दया भरी थी। वह हिंसा और क्रोधसे सर्वथा अछूता था। उसे धर्मका ज्ञान था। वह धर्मस्वरूप, धर्मिष्ठ तथा धर्म प्रदान करनेवाला था। वही धर्मात्माओंमें ‘धर्म’ नामसे विख्यात है। परमात्मा श्रीकृष्णकी कलासे उसका प्रादुर्भाव हुआ है, श्रीकृष्णके सामने खड़े हुए उस पुरुषने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर प्रणाम किया और सम्पूर्ण कामनाओंके दाता उन सर्वेश्वर परमात्माका स्तवन आरम्भ किया।

धर्म बोले—जो सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, इसलिये ‘कृष्ण’ कहलाते हैं, सर्वव्यापी होनेके कारण जिनकी ‘विष्णु’ संज्ञा है, सबके भीतर निवास करनेसे जिनका नाम ‘वासुदेव’ है, जो ‘परमात्मा’ एवं ‘ईश्वर’ हैं, ‘गोविन्द’, ‘परमानन्द’, ‘एक’, ‘अक्षर’, ‘अच्युत’, ‘गोपेश्वर’, ‘गोपीश्वर’, ‘गोप’, ‘गोरक्षक’, ‘विभु’, ‘गौओंके स्वामी’, ‘गोष्ठनिवासी’, ‘गोवत्स-पुच्छधारी’, ‘गोपों और गोपियोंके मध्य विराजमान’, ‘प्रधान’, ‘पुरुषोत्तम’, ‘नवघनश्याम’, ‘रासवास’ और ‘मनोहर’ आदि नाम धारण करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।

ऐसा कहकर धर्म उठकर खड़े हुए। फिर वे भगवान्‌की आज्ञासे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके साथ वार्तालाप करके उस श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठे। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर धर्मके मुखसे निकले हुए इन चौबीस नामोंका पाठ करता है, वह सर्वथा सुखी और सर्वत्र विजयी होता है। मृत्युके समय उसके मुखसे निश्चय ही हरि-नामका उच्चारण होता है। अतः वह अन्तमें श्रीहरिके परम धाममें जाता है तथा उसे श्रीहरिकी अविचल दास्य-भक्ति प्राप्त होती है। उसके द्वारा सदा धर्मविषयक ही चेष्टा होती है। अधर्ममें उसका मन कभी नहीं लगता। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी फल सदाके लिये उसके हाथमें आ जाता है। उसे देखते ही सारे पाप, सम्पूर्ण भय तथा समस्त दुःख उसी तरह भयसे भाग जाते हैं, जैसे गरुड़पर दृष्टि पड़ते ही सर्प पलायन कर जाते हैं।

सौति कहते हैं—तत्पश्चात् धर्मके वामपार्श्वसे एक रूपवती कन्या प्रकट हुई, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुन्दरी थी। वह ‘मूर्ति’ नामसे विख्यात हुई। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णके मुखसे एक शुक्ल वर्णवाली देवी प्रकट हुई, जो वीणा और पुस्तक धारण करनेवाली थी। वह करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न थी। उसके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंका सौन्दर्य धारण करते थे। उसने अग्निमें शुद्ध किये गये उज्ज्वल वस्त्र धारण कर रखे थे और वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके मुखपर मन्द-मन्द मुस्कराहट छा रही थी। दन्तपंक्ति बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी। अवस्था सोलह वर्षकी थी। वह सुन्दरियोंमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी थी। श्रुतियों, शास्त्रों और विद्वानोंकी परम जननी थी। वह वाणीकी अधिष्ठात्री, कवियोंकी इष्टदेवी, शुद्ध सत्त्वस्वरूपा और शान्तरूपिणी सरस्वती थी। गोविन्दके सामने खड़ी होकर पहले तो उसने वीणावादनके साथ उनके नाम और गुणोंका सुन्दर कीर्तन किया, फिर वह नृत्य करने लगी। श्रीहरिने प्रत्येक कल्पके युग-युगमें जो-जो लीलाएँ की हैं, उन सबका गान करते हुए सरस्वतीने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

सरस्वती बोलीं—‘जो रासमण्डलके मध्य-भागमें विराजमान हैं, रासोल्लासके लिये सदा