ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ३१ उत्सुक रहनेवाले हैं, रत्नसिंहासनपर आसीन हैं, रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं, रासेश्वर एवं श्रेष्ठ रासकर्ता हैं, रासेश्वर राधाके प्राणवल्लभ हैं, रासके अधिष्ठाता देवता हैं तथा रासलीलाद्वारा मनोविनोद करनेवाले हैं, उन भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करती हूँ। जो रासलीलाजनित श्रमसे थक गये हैं, प्रत्येक रासमें विहार करनेवाले हैं तथा रासके लिये उत्कण्ठित हुई गोपियोंके प्राणवल्लभ हैं, उन शान्त मनोहर श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करती हूँ।' यों कहकर प्रसन्न मुखवाली सती सरस्वतीने भगवान्को प्रणाम किया और सफलमनोरथ हो उनकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठीं। जो प्रातःकाल उठकर वाणीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह सदा बुद्धिमान्, धनवान्, विद्वान् और पुत्रवान् होता है। सौति कहते हैं - तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके मनसे एक गौरवर्णा देवी प्रकट हुईं, जो रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बरकी साड़ी शोभा पा रही थी। मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे नवयौवना देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री थीं। वे ही फलरूपसे सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ प्रदान करती हैं। स्वर्गलोकमें उन्हींको स्वर्गलक्ष्मी कहते हैं तथा राजाओंके यहाँ वे ही राजलक्ष्मी कहलाती हैं। श्रीहरिके सामने खड़ी होकर उन साध्वी लक्ष्मीने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उनकी ग्रीवा भक्तिभावसे झुक गयी और उन्होंने उन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया। महालक्ष्मी बोलीं- 'जो सत्यस्वरूप, सत्यके स्वामी और सत्यके बीज हैं, सत्यके आधार, सत्यके ज्ञाता तथा सत्यके मूल हैं, उन सनातन देव श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करती हूँ।' यों कह श्रीहरिको मस्तक नवाकर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली लक्ष्मीदेवी दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई सुखासनपर बैठ गयीं। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णकी बुद्धिसे सबकी अधिष्ठात्री देवी ईश्वरी मूलप्रकृतिका प्रादुर्भाव हुआ। सुतप्त काञ्चनकी-सी कान्तिवाली वे देवी अपनी प्रभासे करोड़ों सूर्योंका तिरस्कार कर रही थीं। उनका मुख मन्द-मन्द मुस्कराहटसे प्रसन्न दिखायी देता था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको मानो छीन लेते थे। उनके श्रीअङ्गोंपर लाल रंगकी साड़ी शोभा पाती थी। वे रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थीं। निद्रा, तृष्णा, क्षुधा, पिपासा, दया, श्रद्धा और क्षमा आदि जो देवियाँ हैं, उन सबकी तथा समस्त शक्तियोंकी वे ईश्वरी और अधिष्ठात्री देवी हैं। उनके सौ भुजाएँ हैं। वे दर्शनमात्रसे भय उत्पन्न करती हैं। उन्हींको दुर्गतिनाशिनी दुर्गा कहा गया है। वे परमात्मा श्रीकृष्णकी शक्तिरूपा तथा तीनों लोकोंकी परा जननी हैं। त्रिशूल, शक्ति, शार्ङ्गधनुष, खड्ग, बाण, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, अक्षमाला, कमण्डलु, वज्र, अङ्कुश, पाश, भुशुण्डि, दण्ड, तोमर, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, पार्जन्यास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा गान्धर्वास्त्र-इन सबको हाथोंमें धारण किये श्रीकृष्णके सामने खड़ी हो, प्रकृति देवीने प्रसन्नतापूर्वक उनका स्तवन किया। प्रकृति बोलीं- प्रभो ! मैं प्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वरूपिणी और सर्वशक्तिस्वरूपा कहलाती हूँ। मेरी शक्तिसे ही यह जगत् शक्तिमान् है तथापि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ; क्योंकि आपने मेरी सृष्टि की है, अतः आप ही तीनों लोकोंके पति, गति, पालक, स्रष्टा, संहारक तथा पुनः सृष्टि करनेवाले हैं। परमानन्द ही आपका स्वरूप है। मैं सानन्द आपकी वन्दना करती हूँ। प्रभो! आप चाहें तो पलक मारते-मारते ब्रह्माका भी पतन हो सकता है। जो भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे करोड़ों विष्णुओंकी सृष्टि कर सकता है, ऐसे आपके अनुपम प्रभावका