भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण वर्णन करनेमें कौन समर्थ है ? आप तीनों लोकोंके चराचर प्राणियों, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुझ-जैसी कितनी ही देवियोंकी खेल- खेलमें ही सृष्टि कर सकते हैं। आप परिपूर्णतम परमात्मा हैं। भलीभाँति स्तुतिके योग्य हैं। विभो ! मैं आपकी सानन्द वन्दना करती हूँ। असंख्य विश्वका आश्रयभूत महान् विराट् पुरुष जिनकी कलाका अंशमात्र है, उन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको मैं आनन्दपूर्वक प्रणाम करती हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, सम्पूर्ण वेद, मैं और सरस्वती - ये सब जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा जो प्रकृतिसे परे हैं, उन आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करती हूँ। वेद तथा श्रेष्ठ विद्वान् लक्षण बताते हुए आपकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं। भला जो निर्लक्ष्य हैं उनकी स्तुति कौन कर सकता है ? ऐसे आप निरीह परमात्माको मैं प्रणाम करती हूँ। ऐसा कहकर दुर्गादेवी श्रीकृष्णको प्रणाम करके उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठ गयीं। जो पूजाकालमें दुर्गाद्वारा किये गये परमात्मा श्रीकृष्णके इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी और सुखी होता है। दुर्गा- देवी उसका घर छोड़कर कभी नहीं जाती हैं। वह भवसागरमें रहकर भी अपने सुयशसे प्रकाशित होता रहता है और अन्तमें श्रीहरिके परम धामको जाता है। (अध्याय ३) सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, अग्निदेव, जल, वरुणदेव, स्वाहा, वरुणाणी, वायुदेव, वायवीदेवी तथा मेदिनीके प्राकट्यका वर्णन सौति कहते हैं - शौनकजी ! तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी जिह्वाके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल वर्णवाली एक मनोहारिणी देवीका प्रादुर्भाव हुआ, जो सफेद साड़ी पहने हुए सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं और हाथमें जपमाला लिये हुए थीं। उन्हें सावित्री कहा गया है। साध्वी सावित्रीने सामने खड़ी हो हाथ जोड़ भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर सनातन परब्रह्म श्रीकृष्णका स्तवन आरम्भ किया। सावित्री बोलीं - भगवन् ! आप सबके बीज (आदिकारण) हैं। सनातन ब्रह्म-ज्योति हैं। परात्पर, निर्विकार एवं निरञ्जन ब्रह्म हैं। आप श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करती हूँ। यों कह मन्द-मन्द मुस्कराती हुई वेदमाता सावित्रीदेवी श्रीहरिको पुनः प्रणाम करके श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर आसीन हुईं। तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके मानससे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। वह पाँच बाणोंद्वारा समस्त कामियोंके मनको मथ डालता है, इसलिये मनीषी पुरुष उसका नाम 'मन्मथ' कहते हैं। उस कामदेवके वामपार्श्वसे एक श्रेष्ठ कामिनी उत्पन्न हुई, जो परम सुन्दरी और सबके मनको मोह लेनेवाली थी। मन्द-मन्द मुस्कराती हुई उस सतीको देखकर समस्त प्राणियोंकी उसमें रति हो गयी! इसीलिये मनीषी पुरुषोंने उसका नाम 'रति' रख दिया। पाँच बाण और पुष्पमय धनुष धारण करनेवाले कामदेव श्रीहरिके सामने खड़े हो उनकी स्तुति करके आज्ञा पाकर रतिके साथ रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बैठे। मारण, स्तम्भन, जृम्भन, शोषण और उन्मादन- ये कामदेवके पाँच बाण हैं। उन्हींको वे धारण करते हैं। अपने बाणोंकी परीक्षा करनेके लिये कामदेवने बारी-बारीसे वे सभी बाण चलाये। फिर तो ईश्वरकी इच्छासे सब लोग कामके वशीभूत हो गये। कामपरवश स्खलित महायोगी ब्रह्माजीका वीर्य अग्निके रूपमें उद्दीप्त हो उठा। वे देवेश्वर