ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जो राधामन्त्रका उपासक होकर प्रतिदिन इस कवचका भक्तिभावसे पाठ करता है, वह विष्णुतुल्य तेजस्वी होता तथा राजसूय-यज्ञका फल पाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, सब प्रकारका दान, सम्पूर्ण व्रतोंमें उपवास, पृथ्वीकी परिक्रमा, समस्त यज्ञोंकी दीक्षाका ग्रहण, सदैव सत्यकी रक्षा, नित्यप्रति श्रीकृष्णकी सेवा, श्रीकृष्ण-नैवेद्यका भक्षण तथा चारों वेदोंका पाठ करनेपर मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे निश्चय ही वह इस कवचके पाठसे पा लेता है। राजद्वारपर, श्मशानभूमिमें, सिंहों और व्याघ्रोंसे भरे हुए वनमें, दावानलमें, विशेष संकटके अवसरपर, डाकुओं और चोरोंसे भय प्राप्त होनेपर, जेल जानेपर, विपत्तिमें पड़ जानेपर, भयंकर एवं अटूट बन्धनमें बँधनेपर तथा रोगोंसे आक्रान्त होनेपर यदि मनुष्य इस कवचको धारण कर ले तो निश्चय ही वह समस्त दुःखोंसे छूट जाता है। दुर्गे! महेश्वरि ! यह तुम्हारा ही कवच तुमसे कहा है। तुम्हीं सर्वरूपा माया हो और छलसे इस विषयमें मुझसे पूछ रही हो। श्रीनारायण कहते हैं— नारद ! इस प्रकार राधिकाकी कथा कहकर बारंबार माधवका स्मरण करके भगवान् शंकरके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी। श्रीकृष्णके समान कोई देवता नहीं है, गङ्गा-जैसी दूसरी नदी नहीं है, पुष्करके समान कोई तीर्थ नहीं है तथा ब्राह्मणसे बढ़कर कोई वर्ण नहीं है। नारद ! जैसे परमाणुसे बढ़कर सूक्ष्म, महाविष्णु (महाविराट्)-से बढ़कर महान् तथा आकाशसे अधिक विस्तृत दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार वैष्णवसे बढ़कर ज्ञानी तथा भगवान् शंकरसे बढ़कर कोई योगीन्द्र नहीं है। देवर्षे ! उन्होंने ही काम, क्रोध, लोभ और मोहपर विजय पायी है। भगवान् शिव सोते, जागते हर समय श्रीकृष्णके ध्यानमें तत्पर रहते हैं। जैसे कृष्ण हैं, वैसे शिव हैं। श्रीकृष्ण और शिवमें कोई भेद नहीं है।* वत्स ! जैसे वैष्णवोंमें शम्भु तथा देवताओंमें माधव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कवचोंमें यह जगन्मङ्गल राधाकवच सर्वोत्तम है। 'शि' यह मङ्गलवाचक है ॐ रां राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च। सर्वसिद्धिप्रदः पातु कपोलं नासिकां मुखम् ॥ क्लीं श्रीं कृष्णप्रिया ङेऽन्तं कण्ठं पातु नमोऽन्तकम्। ॐ रां रासेश्वरी ङेऽन्तं स्कन्धं पातु नमोऽन्तकम् ॥ ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु । वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा वक्षः सदावतु ॥ तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम् । कृष्णप्राणाधिका ङेऽन्तं स्वाहान्तं प्रणवादिकम् ॥ पादयुग्मं च सर्वाङ्गं संततं पातु सर्वतः । राधा रक्षतु प्राच्यां च वह्नौ कृष्णप्रियावतु ॥ दक्षे रासेश्वरी पातु गोपीशा नैर्ऋतेऽवतु । पश्चिमे निर्गुणा पातु वायव्ये कृष्णपूजिता ॥ उत्तरे संततं पातु मूलप्रकृतिरीश्वरी । सर्वेश्वरी सदैशान्यं पातु मां सर्वपूजिता ॥ जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे तथा। महाविष्णोश्च जननी सर्वतः पातु संततम् ॥ कवचं कथितं दुर्गे श्रीजगन्मङ्गलं परम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं गूढाद् गूढ़तरं परम् ॥ तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् । गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालंकारचन्दनैः ॥ कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ धृत्वा विष्णुसमो भवेत् । शतलक्षजपेनैव सिद्धं च कवचं भवेत् ॥ यदि स्यात् सिद्धकवचो न दग्धो वह्निना भवेत् । एतस्मात् कवचाद् दुर्गे राजा दुर्योधनः पुरा ॥ विशारदो जलस्तम्भे वह्निस्तम्भे च निश्चितम्। मया सनत्कुमाराय पुरा दत्तं च पुष्करे ॥ सूर्यपर्वणि मेरौ च स सान्दीपनये ददौ । बलाय तेन दत्तं च ददौ दुर्योधनाय सः ॥ कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥ (प्रकृतिखण्ड ५६। ३२-४९)
- यथा कृष्णस्तथा शम्भुर्न भेदो माधवेशयोः ॥ (प्रकृतिखण्ड ५६। ६१)