भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड २९९

और 'व' कारका अर्थ है दाता। जो मङ्गलदाता है, वही शिव कहा गया है। जो विश्वके मनुष्योंका सदा 'शं' अर्थात् कल्याण करते हैं, वे ही शंकर कहे गये हैं। कल्याणका तात्पर्य यहाँ मोक्षसे है। ब्रह्मा आदि देवता तथा वेदवादी मुनि—ये महान् कहे गये हैं। उन महान् पुरुषोंके जो देवता हैं, उन्हें महादेव कहते हैं। सम्पूर्ण विश्वमें पूजित मूलप्रकृति ईश्वरीको महती देवी कहा गया है। उस महादेवीके द्वारा पूजित देवताका नाम महादेव है। विश्वमें स्थित जितने महान् हैं, उन सबके वे ईश्वर हैं। इसलिये मनीषी पुरुष इन्हें महेश्वर कहते हैं।*—ब्रह्मपुत्र नारद! तुम धन्य हो, जिसके गुरु श्रीकृष्णभक्ति प्रदान करनेवाले साक्षात् महेश्वर हैं। फिर तुम मुझसे क्यों पूछ रहे हो! (अध्याय ५६)


दुर्गाजीके सोलह नामोंकी व्याख्या, दुर्गाकी उत्पत्ति तथा उनके पूजनकी परम्पराका संक्षिप्त वर्णन

नारदजी बोले— ब्रह्मन्! मैंने अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण उपाख्यानोंको सुना। अब दुर्गाजीके उत्तम उपाख्यानको सुनना चाहता हूँ। वेदकी कौथुमी शाखामें जो दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमङ्गला, अम्बिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी—ये सोलह नाम बताये गये हैं, वे सबके लिये कल्याणदायक हैं। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारायण! इन सोलह नामोंका जो उत्तम अर्थ है, वह सबको अभीष्ट है। उसमें सर्वसम्मत वेदोक्त अर्थको आप बताइये। पहले किसने दुर्गाजीकी पूजा की है? फिर दूसरी, तीसरी और चौथी बार किन-किन लोगोंने उनका सर्वत्र पूजन किया है?

श्रीनारायणने कहा— देवर्षे! भगवान् विष्णुने वेदमें इन सोलह नामोंका अर्थ किया है, तुम उसे जानते हो तो भी मुझसे पुनः पूछते हो। अच्छा, मैं आगमोंके अनुसार उन नामोंका अर्थ कहता हूँ। दुर्गा शब्दका पदच्छेद यों है—दुर्ग+आ। 'दुर्ग' शब्द दैत्य, महाविघ्न, भवबन्धन, कर्म, शोक, दुःख, नरक, यमदण्ड, जन्म, महान् भय तथा अत्यन्त रोगके अर्थमें आता है तथा 'आ' शब्द 'हन्ता' का वाचक है। जो देवी इन दैत्य और महाविघ्न आदिका हनन करती है, उसे 'दुर्गा' कहा गया है। यह दुर्गा यश, तेज, रूप और गुणोंमें नारायणके समान है तथा नारायणकी ही शक्ति है। इसलिये 'नारायणी' कही गयी है। ईशानाका पदच्छेद इस प्रकार है—ईशान+आ। 'ईशान' शब्द सम्पूर्ण सिद्धियोंके अर्थमें प्रयुक्त होता है और 'आ' शब्द दाताका वाचक है। जो सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली है, वह देवी 'ईशाना' कही गयी है। पूर्वकालमें सृष्टिके समय परमात्मा विष्णुने मायाकी सृष्टि की थी और अपनी उस मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्वको मोहित किया। वह मायादेवी विष्णुकी ही शक्ति है, इसलिये 'विष्णुमाया' कही गयी है। 'शिवा' शब्दका पदच्छेद यों है—शिव+आ। 'शिव' शब्द शिव एवं कल्याण-


* शिरिति मङ्गलार्थं च वकारो दातृवाचकः। मङ्गलानां प्रदाता यः स शिवः परिकीर्तितः॥
नराणां संततं विश्वे शं कल्याणं करोति यः। कल्याणं मोक्षवचनं स एव शंकरः स्मृतः॥
ब्रह्मादीनां सुराणां च मुनीनां वेदवादिनाम्। तेषां च महतां देवो महादेवः प्रकीर्तितः॥
महती पूजिता विश्वे मूलप्रकृतिरीश्वरी। तस्या देवः पूजितश्च महादेवः स च स्मृतः॥
विश्वस्थानां च सर्वेषां महतामीश्वरः स्वयम्। महेश्वरं च तेनेमं प्रवदन्ति मनीषिणः॥
(प्रकृतिखण्ड ५६। ६३—६७)