भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड ३०३

प्राप्त हुआ करती है। राजन्! मैं प्रचेताका पुत्र और ब्रह्माजीका पौत्र हूँ तथा भगवान् शंकरसे ज्ञान प्राप्त करके परमात्मा श्रीकृष्णका भजन करता हूँ। महाराज! नदीके तटपर जाओ और सनातनी दुर्गाका भजन करो। तुम्हारे मनमें राज्यकी कामना है, इसलिये वे देवी तुम्हें आवरणी बुद्धि प्रदान करेंगी तथा इस निष्काम वैष्णव वैश्यको वे कृपामयी वैष्णवीदेवी शुद्ध विवेचना-बुद्धि देंगी। ऐसा कहकर कृपानिधान मुनिवर मेधस्‌ने उन दोनोंको दुर्गाजीकी पूजाकी विधि, स्तोत्र, कवच और मन्त्रका उपदेश दिया। वैश्यने उन कृपामयी देवीकी आराधना करके मोक्ष प्राप्त किया तथा राजाको अपना अभीष्ट राज्य, मनुका पद और मनोवाञ्छित परम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार मैंने सुखद, सारभूत एवं मोक्षदायक परम उत्तम दुर्गाका उपाख्यान पूर्णरूपसे सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय ६२)


सुरथ और समाधिपर देवीकी कृपा और वरदान, देवीकी पूजाका विधान, ध्यान, प्रतिमाकी स्थापना, परिहारस्तुति, शङ्खमें तीर्थोंका आवाहन तथा देवीके षोडशोपचार-पूजनका क्रम

नारदजीने पूछा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग नारायण! अब कृपया यह बताइये कि राजाने किस प्रकारसे पराप्रकृतिका सेवन किया था? समाधि नामक वैश्यने भी किस प्रकार प्रकृतिका उपदेश पाकर निर्गुण एवं निष्काम परमात्मा श्रीकृष्णको प्राप्त किया था। उनकी पूजाका विधान, ध्यान, मन्त्र, स्तोत्र अथवा कवच क्या है? जिसका उपदेश महामुनि मेधस्‌ने राजा सुरथको दिया था। समाधि वैश्यको देवी प्रकृतिने कौन-सा उत्तम ज्ञान दिया था? किस उपायसे उन दोनोंको सहसा प्रकृतिदेवीका साक्षात्कार प्राप्त हुआ था? वैश्यने ज्ञान पाकर किस दुर्लभ पदको प्राप्त किया था? अथवा राजाकी क्या गति हुई थी? उसे मैं सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायणने कहा— मुने! राजा सुरथ और समाधि वैश्यने मेधस् मुनिसे देवीका मन्त्र, स्तोत्र, कवच, ध्यान तथा पुरश्चरण-विधि प्राप्त करके पुष्करतीर्थमें उत्तम मन्त्रका जप आरम्भ कर दिया। वे एक वर्षतक त्रिकाल स्नान करके देवीकी समाराधनामें लगे रहे, फिर दोनों शुद्ध हो गये। वहीं उन्हें मूलप्रकृति ईश्वरीके साक्षात् दर्शन हुए। देवीने राजाको राज्यप्राप्तिका वर दिया। भविष्यमें मनुके पद और मनोवाञ्छित सुखकी प्राप्तिके लिये आश्वासन दिया। परमात्मा श्रीकृष्णने भगवान् शंकरको जो पूर्वकालमें ज्ञान दिया था, वही परम दुर्लभ गूढ़ ज्ञान देवीने वैश्यको दिया। कृपामयी देवी उपवाससे अत्यन्त क्लेश पाते हुए वैश्यको निश्चेष्ट तथा श्वासरहित हुआ देख उसे गोदमें उठाकर दुःख करने लगीं और बार-बार कहने लगीं—‘बेटा! होशमें आओ।' चैतन्यरूपिणी देवीने स्वयं ही उसे चेतना दी। उस चेतनाको पाकर वैश्य होशमें आया और प्रकृतिदेवीके सामने रोने लगा। अत्यन्त कृपामयी देवी उसपर प्रसन्न हो कृपापूर्वक बोलीं।

श्रीप्रकृतिने कहा— बेटा! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो। अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मत्व, अमरत्व, इन्द्रत्व, मनुत्व और सम्पूर्ण सिद्धियोंका संयोग, जो चाहो, ले लो। मैं तुम्हें बालकोंको बहलानेवाली कोई नश्वर वस्तु नहीं दूँगी।

वैश्य बोला— माँ! मुझे ब्रह्मत्व या अमरत्व पानेकी इच्छा नहीं है। उससे भी अत्यन्त दुर्लभ