ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कौन-सी वस्तु है ? यह मैं स्वयं ही नहीं जानता। यदि कोई ऐसी वस्तु हो तो वही मेरे लिये अभीष्ट है। अब मैं तुम्हारी ही शरणमें आया हूँ, तुम्हें जो अभीष्ट हो, वही मुझे दे दो। मुझे ऐसा वर देनेकी कृपा करो, जो नश्वर न हो और सबका सार-तत्त्व हो।
श्रीप्रकृतिने कहा—बेटा! मेरे पास तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है। जो वस्तु मुझे अभीष्ट है, वही मैं तुम्हें दूँगी, जिससे तुम परम दुर्लभ गोलोकधाममें जाओगे। महाभाग वत्स! जो देवर्षियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, वह सबका सारभूत ज्ञान ग्रहण करो और श्रीहरिके धाममें जाओ। भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण, वन्दन, ध्यान, अर्चन, गुण-कीर्तन, श्रवण, भावन, सेवा और सब कुछ श्रीकृष्णको समर्पण—यह वैष्णवोंकी नवधा भक्तिका लक्षण है। यह भक्ति जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा यम-यातनाका नाश करनेवाली है।* जो नवधा भक्तिसे हीन, अधम एवं पापी हैं, उन लोगोंकी सूर्यदेव सदा आयु ही हरते रहते हैं। जो भक्त हैं और भगवान्में जिनका चित्त लगा हुआ है, ऐसे वैष्णव चिरजीवी, जीवन्मुक्त, निष्पाप तथा जन्मादि विकारोंसे रहित होते हैं। शिव, शेषनाग, धर्म, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट्, सनत्कुमार, कपिल, सनक, सनन्दन, वोढु, पञ्चशिख, दक्ष, नारद, सनातन, भृगु, मरीचि, दुर्वासा, कश्यप, पुलह, अङ्गिरा, मेधस्, लोमश, शुक्र, वसिष्ठ, क्रतु, बृहस्पति, कर्दम, शक्ति, अत्रि, पराशर, मार्कण्डेय, बलि, प्रह्लाद, गणेश्वर, यम, सूर्य, वरुण, वायु, चन्द्रमा, अग्नि, अकूपार, उलूक, नाडीजङ्घ, वायुपुत्र हनुमान्, नर, नारायण, कूर्म, इन्द्रद्युम्न और विभीषण—ये परमात्मा श्रीकृष्णकी नवधा भक्तिसे युक्त महान् 'धर्मिष्ठ' भक्तशिरोमणि हैं। वैश्यराज! जो भगवान् श्रीकृष्णके भक्त हैं, वे उन्हींके अंश हैं तथा सदा जीवन्मुक्त रहते हैं। इतना ही नहीं, वे भूमण्डलके समस्त तीर्थोंके पापोंका अपहरण करनेमें समर्थ हैं। ऊपर सात स्वर्ग हैं, बीचमें सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी है और नीचे सात पाताल हैं। ये सब मिलकर 'ब्रह्माण्ड' कहलाते हैं। बेटा! ऐसे विश्व-ब्रह्माण्डोंकी कोई गणना नहीं है। प्रत्येक विश्वमें पृथक्-पृथक् ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, देवर्षि, मनु और मानव आदि हैं। सम्पूर्ण आश्रम भी हैं। सर्वत्र मायाबद्ध जीव रहते हैं। जिन महाविष्णुके रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड वास करते हैं, उन्हें महाविराट् कहते हैं। वे परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। सबके अभीष्ट आत्मा श्रीकृष्ण सत्य, नित्य, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, अच्युत, प्रकृतिसे परे एवं परमेश्वर हैं। तुम उनका भजन करो। वे निरीह, निराकार, निर्विकार, निरञ्जन, निष्काम, निर्विरोध, नित्यानन्द और सनातन हैं। स्वेच्छामय (स्वतन्त्र) तथा सर्वरूप हैं। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही वे दिव्य शरीर धारण करते हैं। परम तेजः-स्वरूप तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। ध्यानके द्वारा उन्हें वशमें कर लिया जाय, यह असम्भव है। शिव आदि योगियोंके लिये भी उनकी आराधना कठिन है। वे सर्वेश्वर, सर्वपूज्य, सबकी सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सबको आनन्द प्रदान करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोंके दाता, सर्वरूप, प्राणरूप, सर्वधर्मस्वरूप, सर्वकारणकारण, सुखद, मोक्षदायक, साररूप, उत्कृष्ट रूपसम्पन्न, भक्तिदायक, दास्यप्रदायक तथा सत्पुरुषोंको सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले हैं। उनसे भिन्न सारा कृत्रिम जगत् नश्वर है।
* स्मरणं वन्दनं ध्यानमर्चनं गुणकीर्तनम्। श्रवणं भावनं सेवा सर्वं कृष्णे निवेदितम्॥
एतदेव वैष्णवानां नवधाभक्तिलक्षणम्। जन्ममृत्युजराव्याधियमताडनखण्डनम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ६३। १९-२०)