भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

प्रकृतिखण्ड

वे परात्परतर शुद्ध, परिपूर्णतम एवं शिवरूप हैं। बेटा! तुम सुखपूर्वक उन्हीं भगवान् अधोक्षजकी शरण लो। 'कृष्ण' यह दो अक्षरोंका मन्त्र श्रीकृष्णदास्य प्रदान करनेवाला है। तुम इसे ग्रहण करो और दुष्कर सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले पुष्करतीर्थमें जाकर इस मन्त्रका दस लाख जप करो। दस लाखके जपसे ही तुम्हारे लिये यह मन्त्र सिद्ध हो जायगा।

ऐसा कहकर भगवती प्रकृति वहीं अन्तर्धान हो गयीं। मुने! उन्हें भक्तिभावसे नमस्कार करके समाधि वैश्य पुष्करतीर्थमें चला गया। पुष्करमें दुष्कर तप करके उसने परमेश्वर श्रीकृष्णको प्राप्त कर लिया। भगवती प्रकृतिके प्रसादसे वह श्रीकृष्णका दास हो गया।

भगवान् नारायण कहते हैं—महाभाग नारद! राजा सुरथने जिस क्रमसे देवी परा प्रकृतिकी आराधना की थी, वह वेदोक्त क्रम बता रहा हूँ, सुनो। महाराज सुरथने स्नान करके आचमन किया। फिर त्रिविध न्यास, करन्यास, अङ्गन्यास तथा मन्त्राङ्गन्यास करके भूतशुद्धि की। इसके बाद प्राणायाम करके शङ्ख-शोधनके अनन्तर देवीका ध्यान किया और मिट्टीकी प्रतिमामें उनका आवाहन किया। फिर भक्तिभावसे ध्यान करके प्रेमपूर्वक उनका पूजन किया। देवीके दाहिने भागमें लक्ष्मीकी स्थापना करके परम धार्मिक नरेशने उनकी भी भक्तिभावसे पूजा की। नारद! तत्पश्चात् देवीके सामने कलशपर गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवताओंका आवाहन करके राजाने विधिपूर्वक भक्तिसे उनका पूजन किया। प्रत्येक विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह पूर्वोक्त छः देवताओंकी पूजा और वन्दना करके महादेवीका प्रेमपूर्वक निम्नाङ्कित रीतिसे ध्यान करे। मुने! सामवेदमें जो ध्यान बताया गया है, वह परम उत्तम तथा कल्पवृक्षके समान वाञ्छापूरक है।

ध्यान

मूलप्रकृति ईश्वरी महादेवीका नित्य ध्यान करे। वे सनातनी देवी ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके लिये भी पूजनीया तथा वन्दनीया हैं। उन्हें नारायणी और विष्णुमाया कहते हैं। वे वैष्णवीदेवी विष्णुभक्ति देनेवाली हैं। यह सब कुछ उनका ही स्वरूप है। वे सबकी ईश्वरी, सबकी आधारभूता, परात्परा, सर्वविद्यारूपिणी, सर्वमन्त्रमयी तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। वे सगुणा और निर्गुणा हैं। सत्यस्वरूपा, श्रेष्ठा, स्वेच्छामयी एवं सती हैं। महाविष्णुकी जननी हैं। श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई हैं। कृष्णप्रिया, कृष्णशक्ति एवं कृष्णबुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रीकृष्णने उनकी स्तुति, पूजा और वन्दना की है। वे कृपामयी हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंकी दीप्तिको भी लज्जित करती है। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द-मन्द हास्यकी छटा छायी हुई है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल हैं। उनका नाम दुर्गादेवी है। वे सौ भुजाओंसे युक्त हैं और महती दुर्गतिका नाश करनेवाली हैं। त्रिनेत्रधारी महादेवजीकी प्रिया हैं। साध्वी हैं। त्रिगुणमयी एवं त्रिलोचना हैं। त्रिलोचन शिवकी प्राणरूपा हैं। उनके मस्तकपर विशुद्ध अर्द्धचन्द्रका मुकुट है। वे मालतीकी पुष्पमालाओंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। उनका मुख सुन्दर एवं गोलाकार है। वे भगवान् शिवके मनको मोहनेवाली हैं। रत्नोंके युगल कुण्डलसे उनके कपोल उद्भासित होते रहते हैं। वे नासिकाके दक्षिण भागमें गजमुक्तासे निर्मित नथ धारण करती हैं। कानोंमें बहुसंख्यक बहुमूल्य रत्नमय आभूषण पहनती हैं। मोतियोंकी पाँतको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपंक्ति उनके मुखकी शोभा बढ़ाती है। पके हुए बिम्बफलके समान उनके लाल-लाल ओठ हैं। वे अत्यन्त प्रसन्न तथा परम मङ्गलमयी हैं। विचित्र पत्ररचनासे रमणीय