ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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उनके कपोल-युगल परम उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। रत्नोंके बने हुए बाजूबन्द, कंगन तथा रत्नमय मञ्जीर उनके विभिन्न अङ्गोंका सौन्दर्य बढ़ाते हैं। रत्नमय कङ्कणोंसे उनके दोनों हाथ विभूषित हैं। रत्नमय पाशक उनकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नमयी अंगूठियोंसे उनके हाथोंकी अँगुलियाँ जगमगाती रहती हैं। पैरोंकी अँगुलियों और नखोंमें लगे हुए महावरकी रेखा उनकी शोभावृद्धि करती है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। उनके विभिन्न अङ्ग गन्ध, चन्दनसे चर्चित हैं। वे कस्तूरीके विन्दुओंसे सुशोभित दो स्तन धारण करती हैं। सम्पूर्ण रूप और गुणोंसे सम्पन्न हैं तथा गजराजके समान मन्द गतिसे चलती हैं। अत्यन्त कान्तिमती तथा शान्तस्वरूपा हैं। योगसिद्धियोंमें बहुत बढ़ी-चढ़ी हैं। विधाताकी भी सृष्टि करनेवाली तथा सबकी माता हैं। समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाली हैं। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति उनका परम सुन्दर मुख है। वे अत्यन्त मनोहारिणी हैं। उनके भालदेशका मध्यभाग कस्तूरी-बिन्दु, चन्दन-बिन्दु तथा सिन्दूर-बिन्दुसे सदा उद्दीप्त होता रहता है। उनके नेत्र शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हुए कमलोंकी कान्तिको छीने लेते हैं। काजलकी सुन्दर रेखाओंसे वे सर्वथा सुशोभित होते हैं। उनके श्रीअङ्ग करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलाको तिरस्कृत करनेवाले हैं। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनका मस्तक उत्तम रत्नोंके बने हुए मुकुटसे उद्भासित होता है। वे स्रष्टाकी सृष्टिमें शिल्परूपा और पालकके पालनमें दयारूपा हैं। संहारकालमें संहारककी उत्तम संहाररूपिणी शक्ति हैं। निशुम्भ और शुम्भको मथ डालनेवाली तथा महिषासुरका मर्दन करनेवाली हैं। पूर्वकालमें त्रिपुर-युद्धके समय त्रिपुरारि महादेवने इनकी स्तुति की थी। मधु और कैटभके युद्धमें वे विष्णुकी शक्तिस्वरूपिणी थीं। समस्त दैत्योंका वध तथा रक्तबीजका विनाश करनेवाली यही हैं। हिरण्यकशिपुके वधकालमें ये नृसिंहशक्तिरूपमें प्रकट हुई थीं। हिरण्याक्षके वधकालमें भगवान् वाराहके भीतर वाराही शक्ति यही थीं। ये परब्रह्मरूपिणी तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।
इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष अपने सिरपर पुष्प रखे और पुनः ध्यान करके भक्तिभावसे आवाहन करे। प्रकृतिकी प्रतिमाका स्पर्श करके मनुष्य इस प्रकार मन्त्र पढ़े तथा मन्त्रद्वारा ही यत्नपूर्वक जीव-न्यास करे।
अम्ब ! भगवति ! सनातनि ! शिवलोकसे आओ, आओ। सुरेश्वरि ! मेरी शारदीया पूजा ग्रहण करो। जगत्पूज्ये ! महेश्वरि ! यहाँ आओ, ठहरो, ठहरो। हे मातः ! हे अम्बिके ! तुम इस प्रतिमामें निवास करो। अच्युते ! इस प्रतिमामें तुम्हारे प्राण निम्नभागमें रहनेवाले प्राणोंके साथ आवें, रहें। तुम्हारी सम्पूर्ण शक्तियाँ इस प्रतिमामें तुरंत पदार्पण करें। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गायै स्वाहा।' इस मन्त्रका उच्चारण करके कहे—'हे सदाशिवे ! इस प्रतिमाके हृदयमें प्राण स्थित हों। चण्डिके ! सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता यहाँ आवें। तुम्हारी शक्तियाँ यहाँ आवें। ईश्वर यहाँ आवें। देवि ! तुम इस प्रतिमामें पधारो।' इस प्रकार आवाहन करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे परिहार-स्तुति करनी चाहिये। विप्रवर ! एकाग्रचित्त होकर परिहारको सुनो।
शिवप्रिये ! भगवति अम्बे ! शिवलोकसे जो तुम आयी हो, तुम्हारा स्वागत है। भद्रे ! मुझपर कृपा करो। भद्रकालि ! तुम्हें नमस्कार है। दुर्गे ! माहेश्वरि ! तुम जो मेरे घरमें आयी हो, इससे मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ और मेरा जीवन सफल है। आज मेरा जन्म सफल और जीवन सार्थक हुआ; क्योंकि मैं भारतवर्षके पुण्यक्षेत्रमें दुर्गाजीका पूजन करता हूँ। जो विद्वान् भारतवर्षमें आप पूजनीया दुर्गाका पूजन करता है, वह अन्तमें गोलोकधामको जाता है और इहलोकमें भी उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न