भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रकृतिखण्ड ३०७

बना रहता है। वैष्णवीदेवीकी पूजा करके विद्वान् पुरुष विष्णुलोकमें जाता है और माहेश्वरीकी पूजा करके वह शिवलोकको प्राप्त होता है। वेदोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसीके भेदसे तीन प्रकारकी देवीकी पूजा बतायी गयी है, जो क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम है। सात्त्विकी पूजा वैष्णवोंकी है, शाक्त आदि राजसी पूजा करते हैं और जो किसी मन्त्रकी दीक्षा नहीं ले सके हैं, ऐसे असत् पुरुषोंकी पूजा तामसी कही गयी है। जो पूजा जीवहत्यासे रहित और श्रेष्ठ है, वही सात्त्विकी एवं वैष्णवी मानी गयी है। वैष्णवलोग वैष्णवीदेवीके वरदानसे गोलोकमें जाते हैं। माहेश्वरी एवं राजसी पूजामें बलिदान होता है। शाक्त आदि राजस पुरुष उस पूजासे कैलासमें जाते हैं। किरात लोग तामसी पूजाद्वारा भूत-प्रेतोंकी आराधना करके नरकमें पड़ते हैं। माँ! तुम्हीं जगत्‌के जीवोंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों फल प्रदान करनेवाली हो। तुम परमात्मा श्रीकृष्णकी सर्वशक्तिस्वरूपा हो। जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका अपहरण करनेवाली परात्परा हो। सुखदायिनी, मोक्षदायिनी, भद्रा (कल्याणकारिणी) तथा सदा श्रीकृष्णभक्ति प्रदान करनेवाली हो। महामाये! नारायणि! दुर्गे! तुम दुर्गतिका नाश करनेवाली हो। दुर्गा नामके स्मरणमात्रसे यहाँ मनुष्योंका दुर्गम कष्ट दूर हो जाता है।

इस प्रकार परिहार-स्तवन करके साधक देवीके बायें भागमें तिपाईके ऊपर शङ्ख रखे। उसमें जल भर दे और दूर्वा, पुष्प तथा चन्दन डाल दे। तत्पश्चात् उसे दाहिने हाथसे पकड़कर मनुष्य इस तरह मन्त्र पढ़े।

'हे शङ्ख! तुम पवित्र वस्तुओंमें परम पवित्र हो, मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। पूर्वकल्पमें शङ्खचूडसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई, इसलिये परम पवित्र हो।' इस विधिसे अर्घ्यपात्रकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष उसे देवीको अर्पित करे।

तदनन्तर सोलह उपचार चढ़ाकर देवीकी पूजा करे। सजल कुशसे त्रिकोण मण्डल बनाकर वहाँ धार्मिक पुरुष कच्छप, शेषनाग और पृथ्वीका पूजन करे। मण्डलके भीतर ही तिपाई रखे और उसके ऊपर शङ्ख। शङ्खमें तीन भाग जल डालकर उसकी पूजा करे तथा उसमें गङ्गा आदि तीर्थोंका आवाहन करते हुए कहे—

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि चन्द्रभागे च कौशकि॥
स्वर्णरेखे कनखले पारिभद्रे च गण्डकि।
श्वेतगङ्गे चन्द्ररेखे पम्पे चम्पे च गोमति॥
पद्मावति त्रिपर्णाशे विपाशे विरजे प्रभे।
शतह्रदे चेलगङ्गे जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥

हे गङ्गे! यमुने! गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु! कावेरि! चन्द्रभागे! कौशकि! स्वर्णरेखे! कनखले! पारिभद्रे! गण्डकि! श्वेतगङ्गे! चन्द्ररेखे! पम्पे! चम्पे! गोमति! पद्मावति! त्रिपर्णाशे! विपाशे! विरजे! प्रभे! शतह्रदे! तथा चेलगङ्गे! आपलोग इस जलमें निवास करें।

तत्पश्चात् उस जलमें तुलसी और चन्दनसे अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, वरुण तथा शिव—इन छः देवताओंकी पूजा करे। फिर उस जलसे समस्त नैवेद्योंका प्रोक्षण करे। इसके बाद एक-एक करके सोलह उपचार समर्पित करे। आसन, वसन, पाद्य, स्नानीय, अनुलेपन, मधुपर्क, गन्ध, अर्घ्य, पुष्प, अभीष्ट नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, रत्नमय भूषण, धूप, दीप और शय्या—ये सोलह उपचार हैं।

(आसन) शंकरप्रिये! अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंद्वारा शोभित श्रेष्ठ सिंहासन ग्रहण करो। (वस्त्र) शिवे! असंख्य सूत्रोंसे बने हुए तथा ईश्वरकी इच्छासे निर्मित प्रज्वलित अग्निद्वारा शुद्ध किया हुआ दिव्य वस्त्र स्वीकार करो। (पाद्य) दुर्गे! बहुमूल्य रत्नमय पात्रमें रखे हुए निर्मल गङ्गाजलको पैर धोनेके लिये पाद्यके रूपमें ग्रहण करो। (स्नानीय) परमेश्वरि! सुगन्धित आँवलेका