ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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स्निग्ध द्रव और परम दुर्लभ सुपक्व विष्णुतैल स्नानीय सामग्रीके रूपमें प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो। (अनुलेपन) जगदम्ब ! कस्तूरी और कुङ्कुमसे मिश्रित सुगन्धित चन्दनद्रव सुवासित अनुलेपनके रूपमें समर्पित है। इसे ग्रहण करो। (मधुपर्क) महादेवि ! रत्नपात्रमें स्थित परम पवित्र एवं परम मङ्गलमय माध्वीक मधुपर्कके रूपमें प्रस्तुत है। इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करो। (गन्ध) देवि ! विभिन्न वृक्षोंके मूलका चूर्ण गन्ध द्रव्यसे युक्त हो परम पवित्र एवं मङ्गलोपयोगी गन्धके रूपमें समर्पित है। इसे ग्रहण करो। (अर्घ्य) चण्डिके ! पवित्र शङ्खपात्रमें स्थित स्वर्गङ्गाका जल दूर्वा, पुष्प और अक्षतसे युक्त अर्घ्यके रूपमें अर्पित है। इसे स्वीकार करो। (पुष्प) जगदम्बिके ! पारिजात-वृक्षसे उत्पन्न सुगन्धित श्रेष्ठ पुष्प और मालती आदि फूलोंकी माला ग्रहण करो। (नैवेद्य) शिवे ! दिव्य सिद्धान्न, आमान्न, पीठा, खीर आदि, लड्डू और दूसरे-दूसरे मिष्टान्न तथा सामयिक फल नैवेद्यके रूपमें प्रस्तुत हैं। इन्हें स्वीकार करो। (आचमनीय) गिरिराजनन्दिनि ! मैंने भक्तिभावसे आचमनीयके रूपमें कर्पूर आदिसे सुसंस्कृत एवं सुवासित शीतल जल अर्पित किया है। इसे ग्रहण करो। (ताम्बूल) देवि ! सुपारी, पान और चूनाको एकत्र करके उसे कर्पूर आदिसे सुवासित किया है। वही यह समस्त भोगोंमें श्रेष्ठ रमणीय ताम्बूल है। इसे स्वीकार करो। (रत्नमय भूषण) देवि ! अत्यन्त मूल्यवान् रत्नोंके सार-भागके द्वारा ईश्वरेच्छासे निर्मित तथा सम्पूर्ण अङ्गोंको शोभासम्पन्न बनानेवाला रत्नमय आभूषण ग्रहण करो। (धूप) देवि ! वृक्षकी गोदके चूर्णको सुगन्धित वस्तुओंसे मिश्रित करके अग्निकी शिखासे शुद्ध किया गया है। इस धूपको स्वीकार करो। (दीप) परमेश्वरि ! घने अन्धकारको दूर करनेवाला यह परम पवित्र दीप दिव्य रत्नविशेष है। इसे ग्रहण करो। (शय्या) देवि ! यह उत्तम दिव्य पर्यङ्क रत्नोंके सारभागसे निर्मित हुआ है। इसपर गद्दा है और वह महीन वस्त्रकी चादरसे ढका हुआ है। तुम इस शय्याको स्वीकार करो।
मुने ! इस प्रकार दुर्गादेवीका पूजन करके उन्हें पुष्पाञ्जलि चढ़ावे। तदनन्तर देवीकी सहचरी आठ नायिकाओंका यत्नतः पूजन करे। उनके नाम इस प्रकार हैं—उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, अतिचण्डा, चामुण्डा, चण्डा और चण्डवती। अष्टदल कमलपर पूर्व आदि दिशाके क्रमसे इनकी स्थापना करके पञ्चोपचारोंद्वारा पूजन करे। दलोंके मध्यभागमें भैरवोंका पूजन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—महाभैरव, संहारभैरव, असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, कालभैरव, क्रोधभैरव, ताम्रचूड़भैरव तथा चन्द्रचूड़भैरव। इन सबकी पूजा करके बीचकी कर्णिकामें नौ शक्तियोंका पूजन करे। क्रम यह है कि कमलके आठ दलोंमें आठ शक्तियोंकी और बीचकी कर्णिकामें नवीं शक्तिकी स्थापना करे। इस तरह इन सबका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। इन शक्तियोंके नाम यों हैं—ब्रह्माणी, वैष्णवी, रौद्री, माहेश्वरी, नारसिंही, वाराही, इन्द्राणी तथा कार्तिकी (कौमारी)। इनके अतिरिक्त नवीं प्रधाना शक्ति हैं सर्वमङ्गला, जो सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। इन नौ शक्तियोंका पूजन करनेके पश्चात् कलशमें देवताओंका पूजन करे। शंकर, कार्तिकेय, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, वरुण, देवीकी चेटी, वटु तथा चौंसठ योगिनी—इन सबका विधिवत् पूजन करके यथाशक्ति भेंट-उपहार अर्पित करके विद्वान् पुरुष स्तुति करे। कवचको भक्तिपूर्वक पढ़कर उसे गलेमें बाँध ले। फिर परिहार नामक स्तुति करके विद्वान् पुरुष देवीको नमस्कार करे। इस प्रकार उपहार दे स्तुति करके कवच बाँधकर विद्वान् पुरुष धरतीपर माथा टेक दण्डवत् प्रणाम करे और ब्राह्मणको दक्षिणा दे।
(अध्याय ६३-६४)