ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
श्रीकृष्ण बोले— देवि! तुम्हीं सबकी जननी, मूलप्रकृति ईश्वरी हो। तुम्हीं सृष्टिकार्यमें आद्याशक्ति हो। तुम अपनी इच्छासे त्रिगुणमयी बनी हुई हो। कार्यवश सगुण रूप धारण करती हो। वास्तवमें स्वयं निर्गुणा हो। सत्या, नित्या, सनातनी एवं परब्रह्मस्वरूपा हो, परमा तेजःस्वरूपा हो। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये दिव्य शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेशा, सर्वाधारा, परात्परा, सर्वबीजस्वरूपा, सर्वपूज्या, निराश्रया, सर्वज्ञा, सर्वतोभद्रा (सब ओरसे मङ्गलमयी), सर्वमङ्गलमङ्गला, सर्वबुद्धिस्वरूपा, सर्वशक्तिरूपिणी, सर्वज्ञानप्रदा देवी, सब कुछ जाननेवाली और सबको उत्पन्न करनेवाली हो। देवताओंके लिये हविष्य दान करनेके निमित्त तुम्हीं स्वाहा हो, पितरोंके लिये श्राद्ध अर्पण करनेके निमित्त तुम स्वयं ही स्वधा हो, सब प्रकारके दानयज्ञमें दक्षिणा हो तथा सम्पूर्ण शक्तियाँ तुम्हारा ही स्वरूप हैं। तुम निद्रा, दया और मनको प्रिय लगनेवाली तृष्णा हो। क्षुधा, क्षमा, शान्ति, ईश्वरी, कान्ति तथा शाश्वती सृष्टि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्रद्धा, पुष्टि, तन्द्रा, लज्जा, शोभा और दया हो। सत्पुरुषोंके यहाँ सम्पत्ति और दुष्टोंके घरमें विपत्ति भी तुम्हीं हो। तुम्हीं पुण्यवानोंके लिये प्रीतिरूप हो, पापियोंके लिये कलहका अङ्कुर हो तथा समस्त जीवोंकी कर्ममयी शक्ति भी सदा तुम्हीं हो। देवताओंको उनका पद प्रदान करनेवाली तुम्हीं हो। धाता (ब्रह्मा)-का भी धारण-पोषण करनेवाली दयामयी धात्री तुम्हीं हो। सम्पूर्ण देवताओंके हितके लिये तुम्हीं समस्त असुरोंका विनाश करती हो। तुम योगनिद्रा हो। योग तुम्हारा स्वरूप है। तुम योगियोंको योग प्रदान करनेवाली हो। सिद्धोंकी सिद्धि भी तुम्हीं हो। तुम सिद्धिदायिनी और सिद्धयोगिनी हो। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, विष्णु-माया, वैष्णवी तथा भद्रदायिनी भद्रकाली भी तुम्हीं हो। तुम्हीं समस्त लोकोंके लिये भय उत्पन्न करती हो। गाँव-गाँवमें ग्रामदेवी और घर-घरमें गृहदेवी भी तुम्हीं हो। तुम्हीं सत्पुरुषोंकी कीर्ति और प्रतिष्ठा हो। दुष्टोंकी होनेवाली सदा निन्दा भी तुम्हारा ही स्वरूप है। तुम महायुद्धमें दुष्टसंहाररूपिणी महामारी हो और शिष्ट पुरुषोंके लिये माताकी भाँति हितकारिणी एवं रक्षारूपिणी हो। ब्रह्मा आदि देवताओंने सदा तुम्हारी वन्दना, पूजा एवं स्तुति की है। ब्राह्मणोंकी ब्राह्मणता और तपस्वीजनोंकी तपस्या भी तुम्हीं हो, विद्वानोंकी विद्या, बुद्धिमानोंकी बुद्धि, सत्पुरुषोंकी मेधा और स्मृति तथा प्रतिभाशाली पुरुषोंकी प्रतिभा भी तुम्हारा ही स्वरूप है। राजाओंका प्रताप और वैश्योंका वाणिज्य भी तुम्हीं हो। विश्वपूजिते! सृष्टिकालमें सृष्टिरूपिणी, पालनकालमें रक्षारूपिणी तथा संहारकालमें विश्वका विनाश करनेवाली महामारीरूपिणी भी तुम्हीं हो। तुम्हीं कालरात्रि, महारात्रि तथा मोहिनी, मोहरात्रि हो; तुम मेरी दुर्लङ्घ्य माया हो, जिसने सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है तथा जिससे मुग्ध हुआ विद्वान् पुरुष भी मोक्षमार्गको नहीं देख पाता।
इस प्रकार परमात्मा श्रीकृष्णद्वारा किये गये दुर्गाके दुर्गम संकटनाशनस्तोत्रका जो पूजाकालमें पाठ करता है, उसे मनोवाञ्छित सिद्धि प्राप्त होती है।
जो नारी वन्ध्या, काकवन्ध्या, मृतवत्सा तथा दुर्भगा है, वह भी एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करके निश्चय ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेती है। जो पुरुष अत्यन्त घोर कारागारके भीतर दृढ़ बन्धनमें बँधा हुआ है, वह एक ही मासतक इस स्तोत्रको सुन ले तो अवश्य ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य राजयक्ष्मा, गलित कोढ़, महाभयंकर शूल और महान् ज्वरसे ग्रस्त है, वह एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण कर