भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

प्रकृतिखण्ड ३१३

ले तो शीघ्र ही रोगसे छुटकारा पा जाता है। पुत्र, प्रजा और पत्नीके साथ भेद (कलह आदि) होनेपर यदि एक मासतक इस स्तोत्रको सुने तो इस संकटसे मुक्ति प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं है। राजद्वार, श्मशान, विशाल वन तथा रणक्षेत्रमें और हिंसक जन्तुके समीप भी इस स्तोत्रके पाठ और श्रवणसे मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। यदि घरमें आग लगी हो, मनुष्य दावानलसे घिर गया हो अथवा डाकुओंकी सेनामें फँस गया हो तो इस स्तोत्रके श्रवणमात्रसे वह उस संकटसे पार हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो महादरिद्र और मूर्ख है, वह भी एक वर्षतक इस स्तोत्रको पढ़े तो निस्संदेह विद्वान् और धनवान् हो जाता है।

नारदजीने कहा—समस्त धर्मोंके ज्ञाता तथा सम्पूर्ण ज्ञानमें विशारद भगवन्! ब्रह्माण्ड-मोहन नामक प्रकृतिकवचका वर्णन कीजिये।

भगवान् नारायण बोले—वत्स! सुनो। मैं उस परम दुर्लभ कवचका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें साक्षात् श्रीकृष्णने ही ब्रह्माजीको इस कवचका उपदेश दिया था। फिर ब्रह्माजीने गङ्गाजीके तटपर धर्मके प्रति इस सम्पूर्ण कवचका वर्णन किया था। फिर धर्मने पुष्करतीर्थमें मुझे कृपापूर्वक इसका उपदेश दिया, यह वही कवच है, जिसे पूर्वकालमें धारण करके त्रिपुरारि शिवने त्रिपुरासुरका वध किया था और ब्रह्माजीने जिसे धारण करके मधु और कैटभसे प्राप्त होनेवाले भयको त्याग दिया था। जिसे धारण करके भद्रकालीने रक्तबीजका संहार किया, देवराज इन्द्रने खोयी हुई राज्य-लक्ष्मी प्राप्त की, महाकाल चिरजीवी और धार्मिक हुए, नन्दी महाज्ञानी होकर सानन्द जीवन बिताने लगा, परशुरामजी शत्रुओंको भय देनेवाले महान् योद्धा बन गये तथा जिसे धारण करके ज्ञानिशिरोमणि दुर्वासा भगवान् शिवके तुल्य हो गये।

'ॐ दुर्गायै स्वाहा' यह मन्त्र मेरे मस्तककी रक्षा करे। इस मन्त्रमें छः अक्षर हैं। यह भक्तोंके लिये कल्पवृक्षके समान है। मुने! इस मन्त्रको ग्रहण करनेके विषयमें वेदोंमें किसी बातका विचार नहीं किया गया है। मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य विष्णुके समान हो जाता है। 'ॐ दुर्गायै नमः' यह मन्त्र सदा मेरे मुखकी रक्षा करे। 'ॐ दुर्गे रक्ष' यह मन्त्र सदा मेरे कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं' यह मन्त्र निरन्तर मेरे कंधेका संरक्षण करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं' यह मन्त्र सदा सब ओरसे मेरे पृष्ठभागका पालन करे। 'ह्रीं' मेरे वक्षःस्थलकी और 'श्रीं' सदा मेरे हाथकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं' यह मन्त्र सोते और जागते समय सदा मेरे सर्वाङ्गका संरक्षण करे। पूर्वदिशामें प्रकृति मेरी रक्षा करे। अग्निकोणमें चण्डिका रक्षा करे। दक्षिणदिशामें भद्रकाली, नैर्ऋत्यकोणमें महेश्वरी, पश्चिमदिशामें वाराही और वायव्यकोणमें सर्वमङ्गला मेरा संरक्षण करे। उत्तरदिशामें वैष्णवी, ईशानकोणमें शिवप्रिया तथा जल, थल और आकाशमें जगदम्बिका मेरा पालन करे।

वत्स! यह परम दुर्लभ कवच मैंने तुमसे कहा है। इसका उपदेश हर एकको नहीं देना चाहिये और न किसीके सामने इसका प्रवचन ही करना चाहिये। जो वस्त्र, आभूषण और चन्दनसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके इस कवचको धारण करता है, वह विष्णु ही है, इसमें संशय नहीं है। मुने! सम्पूर्ण तीर्थोंकी यात्रा और पृथ्वीकी परिक्रमा करनेपर मनुष्यको जो फल मिलता है, वही इस कवचको धारण करनेसे मिल जाता है। पाँच लाख जप करनेसे निश्चय ही यह कवच सिद्ध हो जाता है। जिसने कवचको सिद्ध कर लिया है, उस मनुष्यको रणसंकटमें