ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अस्त्र नहीं बेधता है। अवश्य ही वह जल या अग्निमें प्रवेश कर सकता है। वहाँ उसकी मृत्यु नहीं होती है। वह सम्पूर्ण सिद्धोंका ईश्वर एवं जीवन्मुक्त हो जाता है। जिसको यह कवच सिद्ध हो गया है, वह निश्चय ही भगवान् विष्णुके समान हो जाता है।*
मुने! इस प्रकार प्रकृतिखण्डका वर्णन किया गया, जो अमृतकी खाँड़से भी अधिक मधुर है। जिन्हें मूलप्रकृति कहते हैं तथा जिनके पुत्र गणेश हैं, उन देवी पार्वतीने श्रीकृष्णका व्रत करके ही गणपति-जैसा पुत्र प्राप्त किया था। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने अंशसे गणेश हुए थे। यह प्रकृतिखण्ड सुननेमें सुखद और सुधाके समान मधुर है। इसे सुनकर वक्ताको दही, अन्न भोजन करावे और उसे सुवर्ण दान दे। बछड़ेसहित सुन्दर गौका भक्तिपूर्वक दान करे। मुने! वाचकको वस्त्र, आभूषण तथा रत्न देकर संतुष्ट करे। पुष्प, आभूषण, वस्त्र तथा नाना प्रकारके उपहार ले भक्ति और श्रद्धाके साथ पुस्तककी पूजा करे। जो ऐसा करके कथा सुनता है, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। उसके पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है। वह भगवान्की कृपासे यशस्वी होता है। उसके घरमें लक्ष्मी निवास करती हैं और अन्तमें वह गोलोकको प्राप्त होता है। उसे श्रीकृष्णका दास्यभाव सुलभ होता है तथा भगवान् श्रीकृष्णमें उसकी अविचल भक्ति हो जाती है।
(अध्याय ६६-६७)
॥ प्रकृतिखण्ड सम्पूर्ण ॥
* ॐ दुर्गेति चतुर्थ्यन्तं स्वाहान्तो मे शिरोऽवतु ॥
मन्त्रः षडक्षरोऽयं च भक्तानां कल्पपादपः। विचारो नास्ति वेदेषु ग्रहणे च मनोर्मुने॥
मन्त्रग्रहणमात्रेण विष्णुतुल्यो भवेन्नरः। मम वक्त्रं सदा पातु ॐ दुर्गायै नमोऽन्ततः॥
ॐ दुर्गे रक्ष इति च कण्ठं पातु सदा मम। ॐ ह्रीं श्रीं इति मन्त्रोऽयं स्कन्धं पातु निरन्तरम्॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इति पृष्ठं च पातु मे सर्वतः सदा। ह्रीं मे वक्षःस्थलं पातु हस्तं श्रीमिति संततम्॥
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पातु सर्वाङ्गं स्वप्ने जागरणे तथा। प्राच्यां मां पातु प्रकृतिः पातु वह्नौ च चण्डिका॥
दक्षिणे भद्रकाली च नैर्ऋते च महेश्वरी। वारुणे पातु वाराही वायव्यां सर्वमङ्गला॥
उत्तरे वैष्णवी पातु तथैशान्यं शिवप्रिया। जले स्थले चान्तरिक्षे पातु मां जगदम्बिका॥
इति ते कथितं वत्स कवचं च सुदुर्लभम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालङ्कारचन्दनैः। कवचं धारयेद्यस्तु सोऽपि विष्णुर्न संशयः॥
भ्रमणे सर्वतीर्थानां पृथिव्याश्च प्रदक्षिणे। यत् फलं लभते लोकस्तदेतद्धारणे मुने॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धमेतद्भवेद् ध्रुवम्। लोकं च सिद्धकवचं नास्त्रं विध्यति सङ्कटे॥
न तस्य मृत्युर्भवति जले वह्नौ विशेद् ध्रुवम्। जीवन्मुक्तो भवेत् सोऽपि सर्वसिद्धेश्वरः स्वयम्॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो विष्णुतुल्यो भवेद् ध्रुवम्। (प्रकृतिखण्ड ६७। ७—१९ ½)