ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड
नारदजीकी नारायणसे गणेशचरितके विषयमें जिज्ञासा, नारायणद्वारा शिव-पार्वतीके विवाह तथा स्कन्दकी उत्पत्तिका वर्णन, पार्वतीकी महादेवजीसे पुत्रोत्पत्तिके लिये प्रार्थना, शिवजीका उन्हें पुण्यक-व्रतके लिये प्रेरित करना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीलाको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वती तथा (उस लीलाको संकलित करनेवाले) व्यासजीको नमस्कार करके जय (पुराण-इतिहास आदि)-का पाठ करना चाहिये।
नारदजीने पूछा— भगवन्! जो सर्वोत्कृष्ट, मूढ़ोंके लिये ज्ञानकी वृद्धि करनेवाला तथा अमृतका उत्तम सागर है, उस अभीप्सित प्रकृतिखण्डको तो मैंने सुन लिया। अब मैं गणपतिखण्डको, जो मनुष्योंके सम्पूर्ण मङ्गलोंका भी मङ्गलस्वरूप तथा गणेशजीके जन्म-वृत्तान्तसे परिपूर्ण है, सुनना चाहता हूँ। जगदीश्वर! भला, पार्वतीजीके शुभ उदरसे सुरश्रेष्ठ गणेशकी उत्पत्ति कैसे हुई? किस प्रकार पार्वतीदेवीने ऐसे पुत्रको प्राप्त किया? गणेशजी किस देवताके अंशसे उत्पन्न हुए थे? उन्हें जन्म क्यों लेना पड़ा? वे अयोनिज थे अथवा किसी योनिसे उत्पन्न हुए थे? उनका ब्रह्मतेज कैसा था? उनमें कितना पराक्रम था? उनकी तपस्या कैसी थी? वे कितने ज्ञानी थे तथा उनका यश कितना निर्मल था? जगदीश्वर नारायण, शम्भु और ब्रह्माके रहते हुए सम्पूर्ण विश्वमें उनकी अग्रपूजा क्यों होती है? वे हाथीके मुखवाले एकदन्त तथा विशाल तोंदवाले कैसे हो गये? महाभाग! पुराणोंमें उनके रहस्यमय जन्म-वृत्तान्तका वर्णन किया गया है। आप उस परम मनोहर तथा अत्यन्त विस्तृत चरित्रको पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये मुझे परम कौतूहल हो रहा है।
श्रीनारायणने कहा— नारद! मैं उस परम अद्भुत रहस्यका वर्णन करता हूँ, सुनो! वह पाप-संतापका हरण करनेवाला, सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाशक, समस्त मङ्गलोंका दाता, साररूप, निखिल श्रुतियोंके लिये मनोहर सुखप्रद, मोक्षका बीज तथा पापोंका मूलोच्छेद करनेवाला है। दैत्योंद्वारा पीड़ित हुए देवताओंकी तेजोराशिसे उत्पन्न हुई देवीने दैत्यसमुदायका संहार कर डाला। तत्पश्चात् वे दक्षकी कन्या होकर प्रकट हुईं। उस समय उन देवीका नाम सती था। उन्होंने अपने स्वामी (शिवजी)-की निन्दा होनेके कारण योगधारणाद्वारा अपने शरीरका परित्याग कर दिया और फिर शैलराजकी प्रिय पत्नी (मेना)-के पेटसे जन्म लिया। पर्वतराजने उन पार्वतीजीका विवाह शंकरजीके साथ कर दिया। तब महादेवजी उन्हें साथ लेकर निर्जन वनमें चले गये। वहाँ दीर्घकालतक शंकर-पार्वतीका विहार चलता रहा। जब देवताओंने आकर विहारसे विरत होनेके लिये उनसे प्रार्थना की, तब भगवान् शंकर विरत हो गये। उस समय महादेवजीका शुक्र भूमिपर गिर पड़ा, जिससे स्कन्द—कार्तिकेय उत्पन्न हुए। तब पार्वतीजीने श्रीशंकरजीसे एक श्रेष्ठ पुत्रके लिये प्रार्थना की।
इसपर महादेवजीने कहा— पार्वति! मैं उपाय बतलाता हूँ, सुनो। उससे तुम्हारा परम