भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१६ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कल्याण होगा; क्योंकि त्रिलोकीमें उपाय करनेसे कार्यसिद्धि होती ही है। मैं तुमसे जिस उपायका वर्णन करूँगा, वह सम्पूर्ण अभीष्ट-सिद्धिका बीजरूप, परम मङ्गलदायक तथा मनको हर्ष प्रदान करनेवाला है। वरानने! तुम श्रीहरिकी आराधना करके व्रत आरम्भ करो। एक वर्षतक इसका अनुष्ठान करना होगा। इस व्रतका नाम पुण्यक है। यह महाकठोर बीज, कल्पतरुके समान अभीष्ट सिद्ध करनेवाला, उत्कृष्ट, सुखदायक, पुण्यदाता, साररूप, पुत्रप्रद और समस्त सम्पत्तियोंको देनेवाला है। प्रिये! जैसे नदियोंमें गङ्गा, देवताओंमें श्रीहरि, वैष्णवोंमें मैं (शिव), देवियोंमें तुम, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थोंमें पुष्कर, पुष्पोंमें पारिजात, पत्रोंमें तुलसीदल, पुण्य प्रदान करनेवालोंमें एकादशी तिथि, वारोंमें पुण्यप्रद रविवार, मासोंमें मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वसन्त, वत्सरोंमें संवत्सर, युगोंमें कृतयुग, पूजनीयोंमें विद्या पढ़ानेवाले गुरु, गुरुजनोंमें माता, आप्तजनोंमें साध्वी पत्नी, विश्वस्तोंमें मन, धनोंमें रत्न, प्रियजनोंमें पति, बन्धुजनोंमें पुत्र, वृक्षोंमें कल्पतरु, फलोंमें आमका फल, वर्षोंमें भारतवर्ष, वनोंमें वृन्दावन, स्त्रियोंमें शतरूपा, पुरियोंमें काशी, तेजस्वियोंमें सूर्य, सुखदाताओंमें चन्द्रमा, रूपवानोंमें कामदेव, शास्त्रोंमें वेद, सिद्धोंमें कपिल मुनि, वानरोंमें हनुमान्, क्षेत्रोंमें ब्राह्मणका मुख, यश प्रदान करनेवालोंमें विद्या तथा मनोहारिणी कविता, व्यापक वस्तुओंमें आकाश, शरीरके अङ्गोंमें नेत्र, विभवोंमें हरिकथा, सुखोंमें हरिस्मरण, स्पर्शोंमें पुत्रका स्पर्श, हिंसकोंमें दुष्ट, पापोंमें असत्यभाषण, पापियोंमें पुंश्चली स्त्री, पुण्योंमें सत्यभाषण, तपस्याओंमें श्रीहरिकी सेवा, गव्य पदार्थोंमें घृत, तपस्वियोंमें ब्रह्मा, भक्ष्य वस्तुओंमें अमृत, अन्नोंमें धान, पवित्र करनेवालोंमें जल, शुद्ध पदार्थोंमें अग्नि, तेजस वस्तुओंमें सुवर्ण, मीठे पदार्थोंमें प्रियभाषण,

पक्षियोंमें गरुड़, हाथियोंमें इन्द्रका वाहन ऐरावत, योगियोंमें कुमार (सनत्कुमार आदि), देवर्षियोंमें नारद, गन्धर्वोंमें चित्ररथ, बुद्धिमानोंमें बृहस्पति, श्रेष्ठ कवियोंमें शुक्राचार्य, काव्योंमें पुराण, सोतोंमें समुद्र, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, लाभोंमें मुक्ति, सम्पत्तियोंमें हरिभक्ति, पवित्रोंमें वैष्णव, वर्णोंमें ॐकार, मन्त्रोंमें विष्णुमन्त्र, बीजोंमें प्रकृति, विद्वानोंमें वाणी, छन्दोंमें गायत्री छन्द, यक्षोंमें कुबेर, सर्पोंमें वासुकिनाग, पर्वतोंमें तुम्हारे पिता हिमवान्, गौओंमें सुरभि, वेदोंमें सामवेद, तृणोंमें कुश, सुखप्रदोंमें लक्ष्मी, शीघ्रगामियोंमें मन, अक्षरोंमें अकार, हितैषियोंमें पिता, यन्त्रोंमें शालग्रामशिला, पशु-अस्थियोंमें विष्णुपञ्जर, चौपायोंमें सिंह, जीवधारियोंमें मनुष्य, इन्द्रियोंमें मन, रोगोंमें मन्दाग्नि, बलवानोंमें शक्ति, शक्तिमानोंमें अहंकार, स्थूलोंमें महाविराट्, सूक्ष्मोंमें परमाणु, अदितिपुत्रोंमें इन्द्र, दैत्योंमें बलि, साधुओंमें प्रह्लाद, दानियोंमें दधीचि, अस्त्रोंमें ब्रह्मास्त्र, चक्रोंमें सुदर्शनचक्र, मनुष्योंमें राजा रामचन्द्र और धनुर्धारियोंमें लक्ष्मण श्रेष्ठ हैं तथा जैसे श्रीकृष्ण सर्वाधार, समस्त जीवोंद्वारा सेवनीय, सबके बीजस्वरूप, सर्वाभीष्टप्रदाता और सम्पूर्ण वस्तुओंके साररूप हैं, उसी प्रकार यह पुण्यक-व्रत सम्पूर्ण व्रतोंमें श्रेष्ठ है।