भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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गणपतिखण्ड ३१७


इसलिये महाभागे ! तुम इस व्रतका अनुष्ठान करो, यह तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। इस व्रतके पालनसे ही तुम्हें सम्पूर्ण वस्तुओंका साररूप पुत्र प्राप्त होगा। इस व्रतके द्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंके मनोरथ सिद्ध करनेवाले श्रीकृष्णकी आराधना की जाती है, जिनके सेवनसे मनुष्य अपने करोड़ों पितरोंके साथ मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य विष्णुमन्त्र ग्रहण करके श्रीहरिकी सेवा करता है, वह भारतवर्षमें अपने जन्म-धारणको सफल कर लेता है। वह अपने पूर्वजोंका उद्धार करके निश्चय ही वैकुण्ठमें जाता है और श्रीकृष्णका पार्षद होकर सुखपूर्वक आनन्दका उपभोग करता है।

वह भक्त अपने भाई, बन्धु-बान्धव, भृत्य, संगी-साथी तथा अपनी स्त्रीका उद्धार करके श्रीहरिके परमपदको प्राप्त हो जाता है। इसलिये गिरिजें ! तुम इस परम दुर्लभ विष्णुमन्त्रको ग्रहण करो और उस व्रतकालमें इसी मन्त्रका जप करो; क्योंकि यह पितरोंकी मुक्तिका कारण है। यों कहकर भगवान् शंकर गिरिजाके साथ तुरंत ही गङ्गा-तटपर गये और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कवच तथा स्तोत्रसहित मनोहर विष्णुमन्त्र पार्वतीजीको बतलाया। मुने! तत्पश्चात् उन्होंने पार्वतीसे पूजाकी विधि एवं नियमोंका भी वर्णन किया।

(अध्याय १—३)


शिवजीद्वारा पार्वतीसे पुण्यक-व्रतकी सामग्री, विधि तथा फलका वर्णन

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! पुण्यक-व्रतका विधान सुनकर पार्वतीका मन प्रसन्न हो गया। तत्पश्चात् उन्होंने व्रतकी सम्पूर्ण विधिके विषयमें प्रश्न करना आरम्भ किया।

पार्वती बोलीं— नाथ! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, करुणाके सागर तथा परात्पर हैं। दीनबन्धो! इस व्रतका सारा विधान मुझे बतलाइये। प्रभो! कौन-कौन-से द्रव्य और फल इस व्रतमें उपयोगी होते हैं? इसका समय क्या है? किस नियमका पालन करना पड़ता है? इसमें आहारका क्या विधान है? और इसका क्या फल होता है? यह सब मुझ विनम्र सेविकासे वर्णन कीजिये। साथ ही एक उत्तम पुरोहित, पुष्प एकत्रित करनेके लिये ब्राह्मण और सामग्री जुटानेके लिये भृत्योंको भी नियुक्त कर दीजिये। इनके अतिरिक्त और भी जो व्रतोपयोगी वस्तुएँ हैं, जिन्हें मैं नहीं जानती हूँ, वह सब भी एकत्र करा दीजिये; क्योंकि स्त्रियोंके लिये स्वामी ही सब कुछ प्रदान करनेवाला होता है। स्त्रियोंकी तीन अवस्थाएँ होती हैं—कौमार, युवा और वृद्ध। कौमार-अवस्थामें पिता, युवावस्थामें पति और वृद्धावस्थामें पुत्र सब तरहसे पालन करनेवाले होते हैं। प्राणनाथ! आप तो सर्वात्मा, ऐश्वर्यशाली, सर्वसाक्षी और सर्वज्ञ हैं, अतः अपने आत्माकी निर्वृत्तिका कारणभूत एक श्रेष्ठ पुत्र मुझे प्रदान कीजिये। भगवन्! यह तो मैंने अपनी जानकारीके अनुरूप आप-जैसे महात्मासे निवेदन किया है। आप तो सबके आन्तरिक अभिप्रायके ज्ञाता और परम ज्ञानी हैं। भला, मैं आपको क्या समझा सकती हूँ? यों कहकर पार्वतीने प्रेमपूर्वक अपने पतिदेवके चरणोंमें माथा टेक दिया। तब कृपासिन्धु भगवान् शिव कहनेको उद्यत हुए।

श्रीमहादेवजीने कहा— देवि! मैं इस व्रतकी विधि, नियम, फल और व्रतोपयोगी द्रव्यों तथा फलोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। इस व्रतके हेतु मैं फल-पुष्प लानेके लिये सौ शुद्ध ब्राह्मणोंको, सामग्री जुटानेके निमित्त सौ भृत्यों और बहुसंख्यक दासियोंको तथा पुरोहितके स्थानपर सनत्कुमारको, जो सम्पूर्ण व्रतोंकी विधिके ज्ञाता, वेद-वेदान्तके पारंगत विद्वान्, हरिभक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, उत्तम

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