भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 810 में से

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पृष्ठ 358

३४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण अधीन है। दैवसे बढ़कर दूसरा कोई बली नहीं है। वह दैव श्रीकृष्णके वशमें रहनेवाला है; क्योंकि वे दैवसे परे हैं। इसीलिये संतलोग उन ऐश्वर्यशाली परमात्माका निरन्तर भजन करते हैं। अविनाशी श्रीकृष्ण अपनी लीलासे दैवको बढ़ाने और घटानेमें समर्थ हैं। उनका भक्त दैवके वशीभूत नहीं होता—ऐसा निर्णीत है। इसलिये आपलोग इस दुःखदायक मोहका परित्याग कीजिये और जो सुखदाता, मोक्षप्रद, सारसर्वस्व, जन्म- मृत्युके भयके विनाशकर्ता, परमानन्दके जनक और मोह-जालके उच्छेदक हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवगण जिनका निरन्तर भजन करते हैं, उन गोविन्दकी भक्ति कीजिये। इस भवसागरमें मैं आपलोगोंका कौन हूँ और आपलोग मेरी कौन हैं? संसार-प्रवाहका वह सारा कर्म फेनकी भाँति पुञ्जीभूत हो गया है। (वस्तुतः कोई किसीका नहीं है।) संयोग अथवा वियोग—यह सब ईश्वरकी इच्छासे ही होता है। यहाँतक कि सारा ब्रह्माण्ड ईश्वरके अधीन है, वह भी स्वतन्त्र नहीं है—ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। सारी त्रिलोकी जलके बुलबुलेके समान क्षणभङ्गुर है, फिर भी मायासे मोहित चित्तवाले लोग इस अनित्य जगत्में मायाका विस्तार करते हैं; परंतु जो श्रीकृष्णपरायण संत हैं, वे जगत्में रहते हुए भी वायुकी भाँति लिप्त नहीं होते। इसलिये माताओ! आपलोग मोहका परित्याग करके मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये। यों कहकर ऐश्वर्यशाली कार्तिकेयने उन कृत्तिकाओंको नमस्कार किया और फिर मन- ही-मन श्रीहरिका स्मरण करते हुए शंकरजीके पार्षदोंके साथ यात्राके लिये प्रस्थान किया। इसी बीच उन्होंने वहाँ एक उत्तम रथको देखा। वह बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसे विश्वकर्माने भलीभाँति निर्माण किया था, उसमें स्थान- स्थानपर माणिक्य और हीरे जड़े गये थे, जिससे उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। पारिजात- पुष्पोंकी मालावलीसे वह सुशोभित था। मणियोंके दर्पण तथा श्वेत चँवरोंसे वह अत्यन्त उद्भासित हो रहा था और चित्रकारीयुक्त रमणीय क्रीडा- भवनोंसे वह भलीभाँति सुसज्जित था। वह मनोहर तो था ही, उसका विस्तार भी बड़ा था। उसमें सौ पहिये लगे थे। उसका वेग मनके समान था और श्रेष्ठ पार्षद उसे घेरे हुए थे। उस रथको पार्वतीने भेजा था। उस रथपर कार्तिकेयको चढ़ते देखकर कृत्तिकाओंका हृदय दुःखसे फटा जा रहा था। उनके केश खुल गये थे और वे शोकसे व्याकुल थीं। सहसा चेतना प्राप्त होनेपर अपने सामने स्कन्दको देख वे अत्यन्त शोकके कारण ठगी-सी रह गयीं; फिर वहीं भयवश उन्मत्तकी भाँति कहने लगीं। कृत्तिकाओोंने कहा—हाय! अब हमलोग क्या करें, कहाँ चली जायें ? बेटा ! हमारे आश्रय तो तुम्हीं हो। इस समय तुम हमलोगोंको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? यह तुम्हारे लिये धर्मसङ्गत बात नहीं है। हमलोगोंने बड़े स्नेहसे तुम्हें पाला-पोसा है, अतः तुम धर्मानुसार हमारे पुत्र हो। भला, उपयुक्त पुत्र मातृवर्गोंका परित्याग कर दे—यह भी कोई धर्म है? यों कहकर सभी कृत्तिकाओोंने कार्तिकेयको छातीसे चिपका लिया और पुत्र- वियोगजन्य दारुण दुःखके कारण वे पुनः मूर्च्छित हो गयीं। मुने ! तत्पश्चात् कुमार कार्तिकेयने आध्यात्मिक वचनोंद्वारा उन्हें समझाया और फिर उनके तथा पार्षदोंके साथ वे उस रथपर सवार हुए। मुने ! यात्राकालमें उन्होंने अपने सामने साँड़, गजराज, घोड़ा, जलती हुई आग, भरा हुआ सुवर्ण-कलश, अनेक प्रकारके पके हुए फल, पति-पुत्रसे युक्त स्त्री, प्रदीप, उत्तम मणि, मोती, पुष्पमाला, मछली और चन्दन—इन माङ्गलिक वस्तुओंको, वामभागमें शृगाल, नकुल, कुम्भ और शुभदायक शवको तथा दक्षिणभागमें राजहंस,

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