ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 359, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ३४९
मयूर, खञ्जन, शुक, कोकिल, कबूतर, शङ्खचिल्ल (सफेद चील), माङ्गल्यिक चक्रवाक, कृष्णसार-मृग, सुरभी और चमरी गौ, श्वेत चँवर, सवत्सा धेनु और शुभ पताकाको देखा। उस समय नाना प्रकारके बाजोंकी मङ्गलध्वनि सुनायी पड़ने लगी, हरिकीर्तन तथा घण्टा और शङ्खका शब्द होने लगा। इस प्रकार मङ्गल-शकुनोंको देखते तथा सुनते हुए कार्तिकेय आनन्दपूर्वक उस मनके समान वेगशाली रथके द्वारा क्षणमात्रमें ही पिताके मन्दिरपर जा पहुँचे। वहाँ कैलासपर पहुँचकर वे अविनाशी वट-वृक्षके नीचे कृत्तिकाओं तथा श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ कुछ देरके लिये ठहर गये। उस नगरके राजमार्ग बड़े मनोहर थे। उनपर चारों ओर पद्मराग और इन्द्रनीलमणि जड़ी हुई थी। समूह-के-समूह केलेके खंभे गड़े थे, जिनपर रेशमी सूतमें गुँथे हुए चन्दनके पल्लवोंकी बन्दनवार लटक रही थी। वह पूर्ण कुम्भोंसे सुशोभित था। उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। असंख्यों रत्नप्रदीपों तथा मणियोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह सदा उत्सवोंसे व्याप्त, हाथोंमें दूब और पुष्प लिये हुए वन्दियों और ब्राह्मणोंसे युक्त तथा पति-पुत्रवती साध्वी नारियोंसे समन्वित था। समस्त मङ्गल-कार्य करके पार्वती देवी लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, तुलसी, रति, अरुन्धती, अहल्या, दिति, सुन्दरी तारा, अदिति, शतरूपा, शची, संध्या, रोहिणी, अनसूया, स्वाहा, संज्ञा, वरुण-पत्नी, आकूति, प्रसूति, देवहूति, मेनका, एक रंग तथा एक प्रकृतिवाली मैनाक-पत्नी, वसुन्धरा और मनसादेवीको आगे करके वहाँ आयीं। तदनन्तर देवगण, मुनिसमुदाय, पर्वत, गन्धर्व तथा किन्नर सब-के-सब आनन्दमग्न हो कुमारके स्वागतमें गये। महेश्वर भी नाना प्रकारके बाजों, रुद्रगणों, पार्षदों, भैरवों तथा क्षेत्रपालोंके साथ वहाँ पधारे। तत्पश्चात् शक्तिधारी कार्तिकेय पार्वतीको निकट देखकर हर्षगद्गद हो गये। उस समय वे तुरंत ही रथसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करने लगे। तब पार्वतीने कार्तिकेयको देखकर लक्ष्मी आदि देवियों, मुनि-पत्नियों और शिव आदि सभीसे यत्नपूर्वक परम भक्तिके साथ सम्भाषण किया और उन्हें अपनी गोदमें उठाकर वे चूमने लगीं। फिर शंकर, देवगण, पर्वत, शैलपत्नियों, पार्वती आदि देवियों तथा सभी मुनियोंने कार्तिकेयको शुभाशीर्वाद दिया। तदनन्तर कुमार गणोंके साथ शिव-भवनमें आये। वहाँ सभाके मध्यमें उन्होंने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको देखा। वे रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। धर्म, ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु आदि देवता उन्हें घेरे हुए थे। उनका मुख प्रसन्न था तथा उसपर थोड़ी-थोड़ी मुसकानकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे। उनपर श्वेत चँवर डुलाया जा रहा था और देवेन्द्र तथा मुनीन्द्र उनका स्तवन कर रहे थे। उन जगन्नाथको देखकर कार्तिकेयके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद