ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और सुमाली व्याधिग्रस्त हो गये। उनके शरीरमें सफेद कोढ़ हो गयी, जिससे सारा अङ्ग गल गया, शक्ति जाती रही और प्रभा नष्ट हो गयी। तब स्वयं ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा—'सूर्यके कोपसे ही तुम दोनों हतप्रभ हो गये हो और तुम्हारा शरीर गल गया है, अतः तुमलोग सूर्यका भजन करो।' फिर ब्रह्मा उन दोनोंको सूर्यका कवच, स्तोत्र और पूजाकी सारी विधि बतलाकर ब्रह्मलोकको चले गये। मुने! तदनन्तर वे दोनों पुष्करमें जाकर सूर्यका भजन करने लगे। वहाँ वे तीनों काल स्नान करके भक्तिपूर्वक उत्तम सूर्य-मन्त्रके जपमें तल्लीन हो गये। फिर समयानुसार सूर्यसे वरदान पाकर वे पुनः अपने असली रूपमें आ गये। इस प्रकार मैंने यह सारा वृत्तान्त वर्णन कर दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय १८)
ब्रह्माद्वारा माली-सुमालीको सूर्यके कवच और स्तोत्रकी प्राप्ति तथा सूर्यकी कृपासे उन दोनोंका नीरोग होना
तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर नारायण बोले—नारद! मैं श्रीसूर्यके पूजनका क्रम तथा सम्पूर्ण पापों और व्याधियोंसे विमुक्त करनेवाले कवच और स्तोत्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। जब माली और सुमाली—ये दोनों दैत्य व्याधिग्रस्त हो गये, तब उन्होंने स्तवन करनेके लिये शिव-मन्त्र प्रदान करनेवाले ब्रह्माका स्मरण किया। ब्रह्माने वैकुण्ठमें जाकर कमलापति विष्णुसे पूछा। उस समय शिव भी वहीं श्रीहरिके संनिकट विराजमान थे।
ब्रह्मा बोले—हरे! माली और सुमाली दोनों दैत्य व्याधिग्रस्त हो गये हैं, अतः उनके रोगके विनाशका कौन-सा उपाय है—यह बतलािये।
विष्णुने कहा—ब्रह्मन्! वे दोनों पुष्करमें जाकर वर्षभरतक मेरे अंशभूत व्याधिहन्ता सूर्यकी सेवा करें, इससे वे रोगमुक्त हो जायेंगे।
शंकरने कहा—जगदीश्वर! उन दोनोंको रोगनाशक महात्मा सूर्यका स्तोत्र, कवच और मन्त्र, जो कल्पतरुके समान है, प्रदान कीजिये। ब्रह्मन्! स्वयं श्रीहरि तो सर्वस्व प्रदान करनेवाले हैं और सूर्य रोगनाशक हैं। जिसका जो-जो विषय है, अपने विषयमें ये दोनों सम्पत्ति-प्रदायक हैं। इस प्रकार विष्णु और शिवकी अनुमति पाकर ब्रह्मा उन दैत्योंके घर गये। तब दैत्योंने उन्हें प्रणाम करके कुशल-समाचार पूछा और बैठनेके लिये आसन दिया। उन दैत्योंका शरीर गल गया था, उसमेंसे पीब और दुर्गन्ध निकल रही थी। आहाररहित होनेके कारण वे चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये थे। तब स्वयं दयालु ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा।
ब्रह्मा बोले—वत्सो! तुम दोनों कवच, स्तोत्र और पूजाकी विधिका क्रम ग्रहण करके पुष्करमें जाओ और वहाँ विनम्रभावसे सूर्यका भजन करो।
उन दोनोंने कहा—ब्रह्मन्! किस विधिसे और किस मन्त्रसे हम सूर्यका भजन करें, उनका स्तोत्र कौन-सा है और कवच क्या है—वह सब हमें प्रदान कीजिये।
ब्रह्माने कहा—वत्स! वहाँ त्रिकाल स्नान करके इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भास्करकी भलीभाँति सेवा करनेपर तुमलोग नीरोग हो जाओगे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—)'ॐ ह्रीं नमो भगवते सूर्याय परमात्मने स्वाहा'—इस मन्त्रसे सावधानतया सूर्यका पूजन करके उन्हें भक्तिपूर्वक सोलह उपहार प्रदान करना चाहिये। यों ही पूरे वर्षभरतक करना होगा। इससे तुमलोग निश्चय ही रोगमुक्त हो जाओगे।