ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड
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पूर्वकालमें अहल्याका हरण करनेके कारण गौतमके शापसे जब इन्द्रके शरीरमें सहस्र भग हो गये थे, उस संकट-कालमें बृहस्पतिजीने प्रेमपूर्वक पापयुक्त इन्द्रको जो कवच दिया था, वही अपूर्व सूर्यकवच मैं तुमलोगोंको प्रदान करता हूँ।
बृहस्पतिने कहा— इन्द्र! सुनो। मैं उस परम अद्भुत कवचका वर्णन करता हूँ जिसे धारण करके मुनिगण पवित्र हो भारतवर्षमें जीवन्मुक्त हो गये। इस कवचके धारण करनेवालेके संनिकट व्याधि भयके मारे उसी प्रकार नहीं जाती है, जैसे गरुड़को देखकर साँप दूर भाग जाते हैं। इसे अपने शिष्यको, जो गुरुभक्त और शुद्ध हो, बतलाना चाहिये परंतु जो दूसरेके दुष्ट स्वभाववाले शिष्यको देता है, वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस जगद्विलक्षण कवचके प्रजापति ऋषि हैं, गायत्री छन्द है और स्वयं सूर्य देवता हैं। व्याधिनाश तथा सौन्दर्यके लिये इसका विनियोग किया जाता है। यह सारस्वरूप कवच तत्काल ही पवित्र करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। 'ह्रीं ॐ क्लीं श्रीं श्रीसूर्याय स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। अष्टादशाक्षर$^१$-मन्त्र सदा मेरे कपालको बचावे। 'ॐ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीसूर्याय स्वाहा' मेरी नासिकाको सुरक्षित रखे। सूर्य मेरे नेत्रोंकी, विकर्तन पुतलियोंकी, भास्कर ओठोंकी और दिनकर दाँतोंकी रक्षा करें। प्रचण्ड मेरे गण्डस्थलका, मार्तण्ड कानोंका, मिहिर स्कन्धोंका और पूषा जंघाओंका सदा पालन करें। रवि मेरे वक्षःस्थलकी, स्वयं सूर्य नाभिकी और सर्वदेवनमस्कृत कङ्कालकी सदा देख-रेख करें। ब्रध्न हाथोंको, प्रभाकर पैरोंको और सामर्थ्यशाली विभाकर मेरे सारे शरीरको निरन्तर सुरक्षित रखें। वत्स! यह 'जगद्विलक्षण' नामक कवच अत्यन्त मनोहर तथा त्रिलोकीमें परम दुर्लभ है। इसे मैंने तुम्हें बतला दिया। पूर्वकालमें पुलस्त्यने पुष्करक्षेत्रमें प्रसन्न होकर इसे मनुको दिया था, वही मैं तुम्हें दे रहा हूँ। इसे तुम जिस-किसीको मत दे देना। इस कवचकी कृपासे तुम्हारा रोग नष्ट हो जायगा और तुम नीरोग तथा श्रीसम्पन्न हो जाओगे—इसमें संशय नहीं है। एक लाख वर्षतक हविष्य-भोजनसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वह फल निश्चय ही इस कवचके धारणसे प्राप्त हो जाता है। इस कवचको जाने बिना जो मूर्ख सूर्यकी भक्ति करता है, उसे दस लाख जप करनेपर भी मन्त्रसिद्धि नहीं प्राप्त होती।
ब्रह्माने कहा— वत्स! इस कवचको धारण करके सूर्यका स्तवन करनेपर तुमलोग रोग-मुक्त हो जाओगे—यह निश्चित है। सूर्य-स्तवनका वर्णन सामवेदमें हुआ है। यह व्याधिविनाशक, सर्वपापहारी, परमोत्कृष्ट, साररूप और श्री तथा आरोग्यको देनेवाला है।
भगवन्! जो सनातन ब्रह्म, परमधाम, ज्योतीरूप, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, त्रिलोकीके नेत्ररूप, जगन्नाथ, पापनाशक, तपस्याओंके फलदाता, पापियोंको सदा दुःखदायी, कर्मानुरूप फल प्रदान करनेवाले, कर्मके बीजस्वरूप, दयासागर, कर्मरूप, क्रियारूप, रूपरहित, कर्मबीज, ब्रह्मा, विष्णु और महेशके अंशरूप, त्रिगुणात्मक, व्याधिदाता, व्याधिहन्ता, शोक-मोह-भयके विनाशक, सुखदायक, मोक्षदाता, साररूप, भक्तिप्रद, सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, सर्वेश्वर, सर्वरूप, सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी, समस्त लोकोंके दृष्टिगोचर, अप्रत्यक्ष, मनोहर, निरन्तर रसको हरनेवाले, तत्पश्चात् रसदाता, सर्वसिद्धिप्रद, सिद्धस्वरूप, सिद्धेश और सिद्धोंके परम गुरु हैं, उन आपकी मैं स्तुति करना चाहता हूँ। वत्स! मैंने इस स्तवराजका वर्णन कर दिया। यह गोपनीयसे भी परम गोपनीय है।$^२$ जो नित्य
१. 'ॐ ह्रीं नमो भगवते सूर्याय परमात्मने स्वाहा'।
२. ब्रह्मोवाच—
वं ब्रह्म परमधाम ज्योतीरूपं सनातनम्। त्वामहं स्तोतुमिच्छामि भक्तानुग्रहकारकम्॥