ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तीनों काल इसका पाठ करता है, वह समस्त व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है। उसके अंधापन, कोढ़, दरिद्रता, रोग, शोक, भय और कलह—ये सभी विश्वेश्वर सूर्यकी कृपासे निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। जो भयंकर कुष्ठसे दुःखी, गलित अङ्गोंवाला, नेत्रहीन, बड़े-बड़े घावोंसे युक्त, यक्ष्मासे ग्रस्त, महान् शूलरोगसे पीड़ित अथवा नाना प्रकारकी व्याधियोंसे युक्त हो, वह भी यदि एक मासतक हविष्यान्न भोजन करके इस स्तोत्रका श्रवण करे तो निश्चय ही रोगमुक्त हो जाता है और उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। अतः पुत्रो! तुमलोग शीघ्र ही पुष्करमें जाओ और वहाँ सूर्यका भजन करो। यों कहकर ब्रह्मा आनन्दपूर्वक अपने भवनको चले गये। इधर वे दोनों दैत्य सूर्यकी सेवा करके नीरोग हो गये। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पूछे हुए विघ्नेश्वरके विघ्नका कारण तथा सर्वविघ्नहर सूर्यकवच और सूर्यस्तवादि सुना दिये। अब तुम्हारी और क्या सुननेकी इच्छा है? (अध्याय १९)
भगवान् नारायणके निवेदित पुष्पकी अवहेलनासे इन्द्रका श्रीभ्रष्ट होना, पुनः बृहस्पतिके साथ ब्रह्माके पास जाना, ब्रह्माद्वारा दिये गये नारायणस्तोत्र, कवच और मन्त्रके जपसे पुनः श्री प्राप्त करना
तब श्रीनारायणने कहा—नारद! एक बार देवराज इन्द्र निर्जन वनमें, एक पुष्पोद्यानमें गये थे। वहाँ रम्भा अप्सरासे उनका समागम हुआ। तदनन्तर वे दोनों जलविहार करने लगे। इसी बीच मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वैकुण्ठसे कैलास जाते हुए शिष्यमण्डलीसहित वहाँ आ पहुँचे। देवराज इन्द्रने उन्हें प्रणाम किया। मुनिने आशीर्वाद दिया। फिर भगवान् नारायणका दिया हुआ पारिजात-पुष्प इन्द्रको देकर मुनिने कहा—'देवराज! भगवान् नारायणके निवेदित यह पुष्प सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। यह जिसके मस्तकपर रहेगा, वह सर्वत्र विजय प्राप्त करेगा और देवताओंमें अग्रगण्य होकर अग्रपूजाका अधिकारी होगा। महालक्ष्मी छायाकी तरह सदा उसके साथ रहेगी। वह ज्ञान, तेज, बुद्धि, बल—सभी बातोंमें सब देवताओंसे श्रेष्ठ और भगवान् हरिके तुल्य पराक्रमी होगा। परंतु जो पामर अहंकारवश भगवान् श्रीहरिके निवेदित इस पुष्पको मस्तकपर धारण नहीं करेगा, वह अपनी जातिवालोंके सहित श्रीभ्रष्ट हो जायगा।' इतना कहकर दुर्वासाजी शंकरालयको चले गये। इन्द्रने उस पुष्पको अपने सिरपर न धारण करके ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। इससे इन्द्र श्रीभ्रष्ट हो गये। इन्द्रको श्रीभ्रष्ट देख रम्भा उन्हें छोड़कर स्वर्ग चली गयी। गजराज इन्द्रको नीचे गिराकर महान् अरण्यमें चला गया और हथिनीके साथ
त्रैलोक्यलोचनं लोकनाथं पापप्रमोचनम्। तपसां फलदातारं दुःखदं पापिनां सदा॥
कर्मानुरूपफलदं कर्मबीजं दयानिधिम्। कर्मरूपं क्रियारूपमरूपं कर्मबीजकम्॥
ब्रह्मविष्णुमहेशानामंशं च त्रिगुणात्मकम्। व्याधिदं व्याधिहन्तारं शोकमोहभयापहम्।
सुखदं मोक्षदं सारं भक्तिदं सर्वकामदम्॥
सर्वेश्वरं सर्वरूपं साक्षिणं सर्वकर्मणाम्।
प्रत्यक्षं सर्वलोकानामप्रत्यक्षं मनोहरम्॥
शश्वद् रसहरं पश्चाद् रसदं सर्वसिद्धिदम्।
सिद्धिस্বরূপं सिद्धेशं सिद्धानां परमं गुरुम्।
स्तवराजमिति प्रोक्तं गुह्याद्गुह्यतरं परम्। (१९। ३६–४२)