भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 365

गणपतिखण्ड ३५५

विहार करने लगा। उस वनमें उसके बहुत-से बच्चे हुए। इसी समय श्रीहरिने उस हाथीका मस्तक काटकर बालक (गणेश)-के सिरपर लगा दिया। वत्स! गजमुखके लगानेका प्रसङ्ग तुमको सुना दिया। इसके श्रवणसे पाप नष्ट होते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो, सो कहो।

नारदने पूछा— प्रभो! किस ब्रह्मशापके कारण वे सभी देवता श्रीभ्रष्ट हो गये थे। पुनः किस प्रकार उन्होंने उन जगज्जननी कमलाको प्राप्त किया? उस समय महेन्द्रने क्या किया? आप उस परम दुर्लभ गोपनीय रहस्यको बतलानेकी कृपा करें।

नारायणने कहा— नारद! जिसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द हो गयी थी, श्रीसे भ्रष्ट होनेके कारण जिसपर दीनता छायी हुई थी और जिसका आनन्द नष्ट हो गया था, वह इन्द्र गजेन्द्र और रम्भासे पराभूत होकर अमरावतीमें गया। मुने! वहाँ उसने देखा कि उस पुरीमें आनन्दका नामनिशान नहीं है। वह दीनतासे ग्रस्त, बन्धुओंसे हीन और शत्रुवर्गोंसे खचाखच भर गयी है। तब दूतके मुखसे सारा वृत्तान्त सुनकर वह गुरु बृहस्पतिके घर गया और फिर गुरु तथा देवगणोंके साथ वह ब्रह्माकी सभामें जा पहुँचा। वहाँ जाकर देवताओंसहित इन्द्रने तथा बृहस्पतिने ब्रह्माको नमस्कार किया और भक्तिभावसहित वेदविधिके अनुसार स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् बृहस्पतिने प्रजापति ब्रह्मासे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माने नीचे मुख करके कहना आरम्भ किया।

ब्रह्मा बोले— देवेन्द्र! तुम मेरे प्रपौत्र हो और श्रीसम्पन्न होनेसे सदा प्रज्वलित होते रहते हो। किंतु राजन्! लक्ष्मीके समान सुन्दरी शचीके पति होनेपर भी तुम आचरणभ्रष्ट हो जाते हो। जो आचरणभ्रष्ट होता है, उसे लक्ष्मी अथवा यशकी प्राप्ति कहाँसे हो सकती है? वह पापी तो सदा सभी सभाओंमें निन्दाका विषय बना रहता है। रम्भाने तुम्हें हतबुद्धि बना दिया था। इसी कारण तुमने दुर्वासाद्वारा दिये गये श्रीहरिके नैवेद्यको गजराजके मस्तकपर डाल दिया। इस समय सबके द्वारा भोगी जानेवाली वह रम्भा कहाँ है और श्रीसे भ्रष्ट हुए तुम कहाँ ? जिसके कारण तुम्हें लक्ष्मीसे रहित होना पड़ा, वह रम्भा भी तुम्हें क्षणभरमें ही त्यागकर चली गयी; क्योंकि वेश्या चञ्चला होती है। वह धनवानोंको ही पसंद करती है, निर्धनोंको नहीं तथा प्राचीन प्रेमीका तिरस्कार करके नये-नये नायकोंको खोजती रहती है। परंतु वत्स ! जो बीत गया, वह तो चला ही गया; क्योंकि बीता हुआ पुनः वापस नहीं आता। अब तुम लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक नारायणका भजन करो।

इतना कहकर नारायणपरायण ब्रह्माने इन्द्रको जगत्स्रष्टा नारायणका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दिया। तब इन्द्र देवताओं तथा गुरुके साथ पुष्करमें जाकर अपने अभीप्सित मन्त्रका जप करने लगे और कवच ग्रहण करके उसके द्वारा श्रीहरिकी स्तुतिमें तत्पर हो गये। इस प्रकार