भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

... गणपतिखण्ड ३५७ करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता*। नारायण कहते हैं— महामुने! यों जगदीश्वर श्रीहरिने प्रसन्न हो इन्द्रको यह कवच देनेके पश्चात् पुनः जगत्की हित-कामनासे कृपापूर्वक उन्हें 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो महालक्ष्म्यै हरिप्रियायै स्वाहा' यह षोडशाक्षर-मन्त्र भी प्रदान किया। फिर जो गोपनीय, परम दुर्लभ, सिद्धों और मुनिवरोंद्वारा दुष्प्राप्य और निश्चितरूपसे सिद्धिप्रद है, वह सामवेदोक्त शुभ ध्यान भी बतलाया। (वह ध्यान इस प्रकार है—) जिनके शरीरकी आभा श्वेत चम्पाके पुष्पके सदृश तथा कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान है, जो अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ीको धारण किये हुए तथा रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिनके प्रसन्न मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाली, स्वस्थ और अत्यन्त मनोहर हैं, सहस्रदल-कमल जिनका आसन है, जो परम शान्त तथा श्रीहरिकी प्रियतमा पत्नी हैं, उन जगज्जननीका भजन करना चाहिये। देवेन्द्र! इस प्रकारके ध्यानसे जब तुम मनोहारिणी लक्ष्मीका ध्यान करके भक्तिपूर्वक उन्हें षोडशोपचार समर्पित करोगे और आगे कहे जानेवाले स्तोत्रसे उनकी स्तुति करके सिर झुकाओगे, तब उनसे वरदान पाकर तुम दुःखसे मुक्त हो जाओगे। देवराज! महालक्ष्मीका वह सुखप्रद स्तोत्र, जो परम गोपनीय तथा त्रिलोकीमें दुर्लभ है, बतलाता हूँ। सुनो। नारायण कहते हैं—देवि! जिनका स्तवन करनेमें बड़े-बड़े देवेश्वर समर्थ नहीं हैं, उन्हीं आपकी मैं स्तुति करना चाहता हूँ। आप बुद्धिके परे, सूक्ष्म, तेजोरूपा, सनातनी और अत्यन्त अनिर्वचनीया हैं। फिर आपका वर्णन कौन कर सकता है? जगदम्बिके ! आप स्वेच्छामयी, निराकार, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप और मन- वाणीसे परे हैं; तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ। आप चारों वेदोंसे परे, भवसागरको पार करनेके लिये उपायस्वरूप, सम्पूर्ण अन्नों तथा सारी सम्पदाओंकी अधिदेवी हैं और योगियों-योगों, ज्ञानियों-ज्ञानों, वेदों-वेदवेत्ताओंकी जननी हैं; फिर मैं आपका क्या वर्णन कर सकता हूँ! जिनके बिना सारा जगत् निश्चय ही उसी प्रकार

  • श्रीमधुसूदन उवाच- गृहाण कवचं शक्र सर्वदुःखविनाशनम्। परमैश्वर्यजनकं सर्वशत्रुविमर्दनम् ॥ ब्रह्मणे च पुरा दत्तं संसारे च जलप्लुते । यद् धृत्वा जगतां श्रेष्ठः सर्वैश्वर्ययुतो विधिः ॥ बभूवुर्मनवः सर्वे सर्वैश्वर्ययुता यतः । सर्वैश्वर्यप्रदस्यास्य कवचस्य ऋषिर्विधिः ॥ पङ्क्तिश्छन्दश्च सा देवी स्वयं पद्मालया सुर। सिद्धैश्वर्यजपेष्वेव विनियोगः प्रकीर्तितः । यद् धृत्वा कवचं लोकः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ मस्तकं पातु मे पद्मा कण्ठं पातु हरिप्रिया । नासिकां पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचनम् ॥ केशान् केशवकान्ता च कपालं कमलालया। जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं स्कन्धं सम्प्रदा सदा ॥ ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु । ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदावतु। पातु श्रीमर्म कङ्कालं बाहुयुग्मं च ते नमः ॥ ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे सततं चिरम् । ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम् ॥ ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वाङ्गं पातु मे सदा । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः ॥ इति ते कथितं वत्स सर्वसम्पत्करं परम् । सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स सर्वविजयी भवेत् ॥ महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन । तस्य छायेव सततं सा च जन्मनि जन्मनि ॥ इदं कवचमज्ञात्वा भजेल्लक्ष्मीः सुमन्दधीः । शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ( २२।५–१७)