भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वस्तुहीन एवं निष्फल हो जाता है, जैसे दूध पीनेवाले बच्चोंको माताके बिना सुख नहीं मिलता। आप तो जगत्‌की माता हैं; अतः प्रसन्न हो जाइये और हम अत्यन्त भयभीतोंकी रक्षा कीजिये। हमलोग आपके चरणकमलका आश्रय लेकर शरणापन्न हुए हैं। आप शक्तिस्वरूपा जगज्जननीको बारंबार नमस्कार है। ज्ञान, बुद्धि तथा सर्वस्व प्रदान करनेवाली आपको पुनः-पुनः प्रणाम है। महालक्ष्मी! आप हरि-भक्ति प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी, सर्वज्ञा और सब कुछ देनेवाली हैं। आप बारंबार मेरा प्रणिपात स्वीकार करें। माँ! कुपुत्र तो कहीं-कहीं होते हैं, परंतु कुमाता कहीं नहीं होती। क्या कहीं पुत्रके दुष्ट होनेपर माता उसे छोड़कर चली जाती है? हे मातः! आप कृपासिन्धु श्रीहरिकी प्राणप्रिया हैं और भक्तोंपर अनुग्रह करना आपका स्वभाव है; अतः दुधमुँहे बालकोंकी तरह हमलोगोंपर कृपा करो, हमें दर्शन दो। वत्स! इस प्रकार लक्ष्मीका वह शुभकारक स्तोत्र, जो सुखदायक, मोक्षप्रद, साररूप, शुभद और सम्पत्तिका आश्रयस्थान है, तुम्हें बता दिया। जो मनुष्य पूजाके समय इस महान् पुण्यकारक स्तोत्रका पाठ करता है, उसके गृहका महालक्ष्मी कभी परित्याग नहीं करतीं। इन्द्रसे इतना कहकर श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये। तब उनकी आज्ञासे देवताओंके साथ देवराज क्षीरसागरपर गये*। (अध्याय २१)


देवताओंके स्तवन करनेपर महालक्ष्मीका प्रकट होकर देवों और मुनियोंके समक्ष अपने निवास-योग्य स्थानका वर्णन करना

**नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर इन्द्र गुरु बृहस्पति तथा अन्यान्य देवोंको साथ लेकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये प्रसन्न-मनसे शीघ्र ही क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ उन्होंने अमूल्य रत्नकी गुटिकासे युक्त कवचको गलेमें बाँधकर पुनः-पुनः उस दिव्य स्तोत्रका मन-ही-मन स्मरण


* नारायण उवाच—

देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि न क्षमाः स्तोतुमीश्वराः। बुद्धेरगोचरां सूक्ष्मां तेजोरूपां सनातनीम्॥
अत्यनिर्वचनीयां च को वा निर्वक्तुमीश्वरः॥
स्वेच्छामयीं निराकारां भक्तानुग्रहविग्रहाम्। स्तौमि वाङ्मनसोः पारं किं वाहं जगदम्बिके॥
परां चतुर्णां वेदानां पारबीजं भवार्णवे। सर्वशस्याधिदेवीं च सर्वांसामपि सम्पदाम्॥
योगिनां चैव योगानां ज्ञानानां ज्ञानिनां तथा। वेदानां च वेदविदां जननीं वर्णयामि किम्॥
यया विना जगत् सर्वमवस्तु निष्फलं ध्रुवम्। यथा स्तानान्धबालानां विना मात्रासुखं भवेत्॥
प्रसीद जगतां माता रक्षामानतिकातारन्। वयं त्वच्चरणाम्भोजे प्रपन्नाः शरणं गताः॥
नमः शक्तिस्वरूपायै जगन्मात्रे नमो नमः। ज्ञानदायै बुद्धिदायै सर्वदायै नमो नमः॥
हरिभक्तिप्रदायिन्यै मुक्तिदायै नमो नमः। सर्वज्ञायै सर्वदायै महालक्ष्म्यै नमो नमः॥
कुपुत्राः कुत्रचित् सन्ति न कुत्रचित् कुमातरः। कुत्र माता पुत्रदोषे तं विहाय च गच्छति॥
हे मातर्दर्शनं देहि स्तानान्थान् बालकानिव। कृपां कुरु कृपासिन्धुप्रियेऽस्मान् भक्तवत्सले॥
इत्येवं कथितं वत्स पद्मायाश्च शुभावहम्। सुखदं मोक्षदं सारं शुभदं सम्पदः पदम्॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं पूजाकाले च यः पठेत्। महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन॥
इत्युक्त्वा श्रीहरिस्तं च तत्रैवान्तरधीयत। देवो जगाम क्षीरोदं सुरैः सार्धं तदाज्ञया॥
(२२।२७—३९)