ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड | ३६१
नारायणने कहा—नारद! एकदन्तका चरित सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला है। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! एक समयकी बात है, राजा कार्तवीर्य शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ वह बहुत-से वन्य पशुओंका वध करके थक गया। इतनेमें सूर्यास्त हो चला, तब उस राजाने सायंकालमें सेनासहित वहीं वनमें जमदग्नि ऋषिके आश्रमके निकट पड़ाव डाल दिया और बिना कुछ खाये-पीये रात्रि व्यतीत की। प्रातःकाल राजा सरोवरमें स्नान करके पवित्र हुआ और अपने शरीरको अलंकृत करके दत्तात्रेयद्वारा दिये गये मन्त्रका भक्तिपूर्वक जप करने लगा। मुनिवर जमदग्निने देखा कि राजाके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये हैं; तब उन्होंने प्रेमके साथ आदरपूर्वक कोमल वाणीसे राजाका कुशल-समाचार पूछा। तदनन्तर राजाने बड़ी उतावलीके साथ सूर्यके समान तेजस्वी मुनिको प्रणाम किया और मुनिने चरणोंमें पड़े हुए राजाको स्नेहपूर्वक शुभाशीर्वाद दिया। राजाने अपने उपवास आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया; तब मुनिने तुरंत ही डरते-डरते राजाको निमन्त्रण दे दिया। इसके बाद मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि हर्षपूर्वक अपने आश्रमको लौट आये और वहाँ उन्होंने लक्ष्मीसदृशी माता कामधेनुसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब कामधेनु भयभीत हुए मुनिसे बोली—'मुने! मेरे रहते आपको भय कैसा? आप तो मेरे द्वारा सारे जगत्को भोजन करानेमें समर्थ हैं; फिर राजाकी क्या बात है? आप राजाओंके भोजन-योग्य त्रिलोकीमें दुर्लभ जिन-जिन पदार्थोंकी याचना करेंगे, वह सब मैं आपको प्रदान करूँगी।' तदनन्तर कामधेनुने अनेक प्रकारके भोजन करनेके योग्य सोने और चाँदीके बर्तन, असंख्यों भोजन बनानेके पात्र और बहुत-से स्वादिष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण बर्तन मुनिको दिये। फिर नाना प्रकारके स्वादिष्ट और पके हुए कटहल, आम, नारियल और बेलके फल प्रदान किये। नारद! स्वादिष्ट लड्डुओंकी तो असंख्य ढेरियाँ लग गयीं। जौ और गेहूँके आटेकी बनी हुई पूड़ियों और भाँति-भाँतिके पकवानोंका पर्वत तथा उत्तम-उत्तम अन्नोंका ढेर लग गया। दूध, दही और घीकी नदियाँ बह चलीं। शकरका ढेर तथा मोदकोंका पहाड़ लग गया। उत्तम धानके चिउड़ोंका पर्वत-सा ढेर लगा दिया। फिर कौतुकवश राजाओंके योग्य पूर्णतया कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल और सुन्दर वस्त्राभूषण प्रदान किया। इस प्रकार सामग्रीसे सम्पन्न हो मुनिने खेल-ही-खेलमें सेनासहित राजाको मनोहर पदार्थ देकर भोजन कराया। तब जो-जो वस्तुएँ परम दुर्लभ थीं, उन्हें भरीपूरी देखकर राजाधिराज कार्तवीर्यको महान् विस्मय हुआ। फिर उन बर्तनोंको देखकर वह कहने लगा।
राजाने कहा—सचिव! जरा पता तो लगाओ कि ये दुर्लभ पदार्थ सहसा कहाँसे आ गये? ये मेरे लिये असाध्य हैं और बहुतोंका तो मैंने नाम भी नहीं सुना है।
मन्त्री बोला—महाराज! मैंने मुनिके आश्रममें सब कुछ देख लिया है, सुनिये। वहाँ तो अग्निकुण्ड, समिधा, कुश, पुष्प, फल, कृष्णमृगचर्म, स्रुवा, स्रुक्, शिष्यसमुदाय और सूर्यके तेजके आधारपर पकनेवाले अन्न आदि ही हैं। वह सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे रहित है। वहाँ मैंने यह भी देखा है कि सभी लोग जटाधारी हैं और वृक्षोंकी छाल ही उनका वस्त्र है। परंतु आश्रमके एक भागमें मैंने एक मनोहर कपिला गौको देखा है। उसके अङ्ग बड़े सुन्दर हैं। चाँदनीकी-सी उसकी कान्ति है और लाल कमलके समान उसके नेत्र हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिमती वह गौ वहाँ तेजसे उद्दीप्त हो रही थी। वही साक्षात् लक्ष्मीकी तरह सम्पूर्ण सम्पत्तियों और गुणोंकी आधार है।