ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तदनन्तर मन्त्रीके कहनेपर वह दुर्बुद्धि राजा मुनिसे उस गौकी याचना करनेके लिये उद्यत हो गया; क्योंकि वह उस समय सर्वथा कालपाशसे बँधा हुआ था। भला, पुण्य अथवा उत्तम बुद्धि क्या कर सकती है; क्योंकि होनहार ही सब तरहसे बली होता है। इसी कारण पुण्यवान् एवं बुद्धिमान् होकर भी राजेन्द्र कार्तवीर्य दैववश ब्राह्मणसे याचना करना चाहता है। पुण्यसे भारतवर्षमें पुण्यरूप कर्म और पापसे भयदायक पापरूप कर्म प्रकट होता है। पुण्यकर्मसे स्वर्गका भोग करके मनुष्य पुण्यस्थलमें जन्म लेते हैं और पापकर्मसे नरकका भोग करनेके पश्चात् प्राणियोंकी निन्दित योनिमें उत्पत्ति होती है। नारद! कर्मके वर्तमान रहते प्राणियोंका उद्धार नहीं होता; इसलिये संतलोग निरन्तर कर्मका क्षय ही करते रहते हैं। वही विद्या, वही तप, वही ज्ञान, वही गुरु, वही भाई-बन्धु, वही माता, वही पिता और वही पुत्र सार्थक है, जो कर्मक्षयमें सहायता करता है*। प्राणियोंके कर्मोंका शुभ-अशुभ भोग दारुण रोगके समान है, जिसे भक्तरूपी वैद्य श्रीकृष्ण-भक्तिरूपी रसायनके द्वारा नष्ट करते हैं। जगत्का धारण-पोषण करनेवाली बुद्धिदायिनी माया प्रत्येक जन्ममें सेवा किये जानेपर संतुष्ट होकर भक्तको वह भक्ति प्रदान करती है। तदनन्तर मायासे विमुग्ध हुए राजा कार्तवीर्यने यत्नपूर्वक मुनिको अपने पास बुलाया और हर्षके साथ अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उनसे विनयपूर्ण वचन कहा।
**राजा बोला—**भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाले भक्तेश! आप तो कल्पतरुके समान हैं; अतः मुझ भक्तको कामनापूर्ण करने-वाली इस कामधेनुको भिक्षारूपमें प्रदान कीजिये। तपोधन! आप-जैसे दाताओंके लिये भारतमें कोई वस्तु अदेय नहीं है। मैंने सुना भी है कि पूर्वकालमें दधीचिने देवताओंको अपनी हड्डी दे डाली थी। तपोराशे! आप तो भारतवर्षमें लीलापूर्वक भ्रूभङ्गमात्रसे समूह-की-समूह कामधेनुओंकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं।
**मुनिने कहा—**राजन्! आश्चर्य है, तुम तो उलटी बात कह रहे हो। अरे मूर्ख एवं छली नरेश! मैं ब्राह्मण होकर क्षत्रियको दान कैसे दूँगो? इस कामधेनुको परमात्मा श्रीकृष्णने गोलोकमें यज्ञके अवसरपर ब्रह्माको दिया था, अतः प्राणोंसे बढ़कर प्यारी यह गौ देने योग्य नहीं है। भूमिपाल! फिर ब्रह्माने इसे अपने प्रिय पुत्र भृगुको दिया और भृगुने मुझे दिया। इस प्रकार यह कपिला मेरी पैतृक सम्पत्ति है। यह कामधेनु गोलोकमें उत्पन्न हुई है; अतः त्रिलोकीमें दुर्लभ है। तब भला मैं लीलापूर्वक ऐसी कपिलाकी सृष्टि करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ। न तो मैं हलवाहा हूँ और न तुम्हारी सहायतासे बुद्धिमान् हुआ हूँ। मैं अतिथिको छोड़कर शेष सबको क्षणमात्रमें भस्मसात् करनेकी शक्ति रखता हूँ। अतः अपने घर जाओ और स्त्री-पुत्रोंको देखो।
मुनिके इस वचनको सुनकर राजाको क्रोध आ गया। तब वह मुनिको नमस्कार करके सेनाके मध्यमें चला गया। उस समय भाग्यने उसे बाधित कर दिया था; अतः क्रोधके कारण उसके होंठ फड़क रहे थे। उसने सेनाके निकट जाकर बलपूर्वक गौको लानेके लिये नौकरोंको भेजा। इधर शोकके कारण, जिनका विवेक नष्ट हो गया था, वे मुनिवर जमदग्नि कपिलाके संनिकट जाकर रोने लगे और उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाली वह गौ, जो साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा थी, ब्राह्मणको रोते देखकर बोली।
* सा विद्या तत्तपो ज्ञानं स गुरुः स च बान्धवः। सा माता स पिता पुत्रस्तत् क्षयं कारयेत् तु यः॥
( २४। ३५)