भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणपतिखण्ड ३६९

पुनः तुम्हारा होकर उत्पन्न होऊँ, तुम्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हो स्वाहा' इस प्रकार उच्चारण करो तथा श्रीहरिका स्मरण करते हुए इसी मन्त्रसे पिताका दाह करो।* हे भृगुनन्दन! पहले तुम भाइयोंके साथ सिरमें आग लगाओ।'' तब भृगुमुनिके आज्ञानुसार परशुरामने अपने गोत्रवालोंके साथ वह सारा कार्य सम्पन्न किया।

तदनन्तर रेणुकाने वहाँ अपने पुत्र परशुरामको छातीसे लगा लिया और परिणाममें सुखदायक कुछ वचन कहे—'बेटा! इस भवसागरमें विरोध न करना सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल है और विरोध नाशका कारण तथा समस्त उपद्रवोंका हेतु है। अतः भयंकर क्षत्रियोंके साथ विरोध न करना ही उचित है; किंतु मेरे सुनते-सुनते तुमने जो प्रतिज्ञा की है उसे पूर्ण करना चाहिये। इसके लिये तुम दिव्य मन्त्रोंके ज्ञाता भृगु और ब्रह्माके साथ विचार करके जैसा उचित हो वैसा करना। सज्जनोंद्वारा आलोचित कर्म शुभकारक होता है।' यों कहकर रेणुका परशुरामको छोड़कर अपने पतिका आलिङ्गन करके श्रीहरिका स्मरण करते हुए परशुरामकी ओर निहारती हुई चितामें सो गयी। तब भाइयोंके साथ परशुरामने चितामें आग लगा दी। फिर भाइयों और पिताके शिष्योंके साथ वे विलाप करने लगे। इतनेमें ही सती रेणुका 'राम, राम, राम' यों उच्चारण करके परशुरामके देखते-देखते जलकर राख हो गयी। तब अपने स्वामीका नाम सुनकर वहाँ श्रीहरिके दूत आ पहुँचे। वे सभी रथपर सवार थे। उनके शरीरका रंग श्याम था। सुन्दर चार भुजाएँ थीं, जिनमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला लटक रही थी और वे किरीट, कुण्डल तथा रेशमी पीताम्बरसे विभूषित थे। वे उस रेणुकाको रथमें बिठाकर ब्रह्मलोकमें गये और जमदग्निको लेकर श्रीहरिके संनिकट जा पहुँचे। वहाँ वैकुण्ठमें वे दोनों पति-पत्नी निरन्तर श्रीहरिकी परिचर्या, जो मङ्गलोंकी मङ्गल है, करते हुए श्रीहरिके संनिकट रहने लगे।

नारद! इधर परशुरामने ब्राह्मणों तथा भृगुजीके सहयोगसे माता-पिताकी शेष क्रिया समाप्त करके ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान दिया। फिर गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, सुवर्णनिर्मित पलंगसहित मनोरम दिव्य शय्या, जल, अन्न, चन्दन, रत्नदीप, चाँदीका पहाड़, सुवर्णके आधारसहित स्वर्णनिर्मित उत्तम आसन, सुवासित ताम्बूल, छत्र, पादुका, फल, मनोहर माला, फल-मूल-जल और मनोहर मिष्टान्न तथा धन ब्राह्मणोंको देकर वे ब्रह्मलोकको चल पड़े। ब्रह्मलोकमें पहुँचकर परशुरामने भक्तिभावसे अव्ययात्मा ब्रह्माजीको नमस्कार करके रोते हुए सारी घटना कह सुनायी। कृपामय ब्रह्माजीने सारी बातें सुनकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया और अपने हृदयसे लगा लिया। भृगुवंशी परशुरामकी बहुत-से जीवोंका विनाश करनेवाली, दुष्कर एवं भयंकर प्रतिज्ञाको सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माको महान् विस्मय हुआ। वे 'प्रारब्धवश सब कुछ घटित हो सकता है' ऐसा मनमें विचारकर परशुरामसे परिणाममें सुखदायक वचन बोले।

**ब्रह्माने कहा—**वत्स! बहुसंख्यक जीवोंका विनाश करनेवाली तुम्हारी प्रतिज्ञा दुष्कर है; क्योंकि यह सृष्टि भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे उत्पन्न होती है। बेटा! उन्हीं परमेश्वरकी आज्ञासे


* ॐ कृत्वा तु दुष्कृतं कर्म जानता वाप्यजानता। मृत्युकालवशं प्राप्य नरं पञ्चत्वमागतम्॥
ॐ धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोहसमावृतम्। दहेयं सर्वगात्राणि दिव्यान् लोकान् स गच्छतु॥
इमं मन्त्रं पठित्वा तु तातं कृत्वा प्रदक्षिणम्। मन्त्रेणानेन देहाग्नि जनकाय हरिं स्मरन्॥
ॐ अस्मत्कुले त्वं जातोऽसि त्वदीयो जायतां पुनः। असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहेति वद साम्प्रतम्॥
(२८। ३२-३५)