भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मैंने बड़े कष्टसे इस सृष्टिकी रचना की है; किंतु तुम्हारी निर्दयतापूर्ण घोर प्रतिज्ञा सृष्टिका लोप कर देनेवाली है। तुम एक क्षत्रियके अपराधसे पृथ्वीको इक्कीस बार भूपरहित कर देना चाहते हो और क्षत्रिय-जातिको समूल नष्ट करनेकी तुमने ठान ली है। किंतु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र— यह चार प्रकारकी सृष्टि नित्य है, जो श्रीहरिकी ही आज्ञासे पुनः-पुनः आविर्भूत और तिरोहित होती रहती है। अन्यथा किसी प्राक्तन कर्मानुसार तुम्हारी प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। तुम्हें अपनी कार्यसिद्धिके लिये बड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। अतः वत्स! तुम शिवलोकमें जाओ और शंकरकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि भूतलपर बहुत-से नरेश शंकरके भक्त हैं। जब वे शक्तिस्वरूपा पार्वती और शंकरके दिव्य कवचको धारण करके खड़े होंगे, तब महेश्वरकी आज्ञाके बिना उन्हें मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? अतः जो विजयका कारण एवं शुभकारक है, उस उपायको तुम यत्नपूर्वक करो; क्योंकि उपायपूर्वक आरम्भ किये गये कार्य ही सिद्ध होते हैं। इसलिये तुम शंकरसे श्रीकृष्णके मन्त्र और कवचको ग्रहण करो। वह वैष्णव तेज परम दुर्लभ है। उसके प्रभावसे तुम शैव और शाक्त दोनों तेजोंपर विजय पा सकोगे। जगदीश्वर शिव तुम्हारे जन्म-जन्मान्तरके गुरु हैं। अतः मुझसे मन्त्र ग्रहण करना तुम्हारे लिये युक्त नहीं है; क्योंकि जो उपयुक्त होता है, वही विधि है। कर्मभोगसे ही मन्त्र, स्वामी, स्त्री, गुरु और देवता प्राप्त होते हैं। जो जिनके हैं, वे उनके पास स्वयं ही उपस्थित होते हैं, यह ध्रुव है। भृगुनन्दन! तुम त्रैलोक्यविजय नामक श्रेष्ठ कवच ग्रहण करके इक्कीस बार पृथ्वीको भूपरहित कर डालोगे। दानी शंकर तुम्हें दिव्य पाशुपतास्त्र प्रदान करेंगे। उस दिये हुए मन्त्रके बलसे तुम क्षत्रियसमुदायको जीत लोगे। (अध्याय २८)


परशुरामका शिवलोकमें जाकर शिवजीके दर्शन करके उनकी स्तुति करना

नारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर परशुरामने ब्रह्माकी बात सुनकर उन जगद्गुरुको प्रणाम किया और उनसे वरदान पाकर वे सफलमनोरथ हो शिवलोकको चले। वायुके आधारपर टिका हुआ वह मनोहर लोक एक लाख योजन ऊँचा तथा ब्रह्मलोकसे विलक्षण है। उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। उसके दक्षिणभागमें वैकुण्ठ और वामभागमें गौरीलोक है। नीचेकी ओर ध्रुवलोक है, जो सम्पूर्ण लोकोंसे परे कहा जाता है। उन सबके ऊपर पचास करोड़ योजनके विस्तारवाला गोलोक है। उससे ऊपर दूसरा लोक नहीं है। वही सर्वोपरि कहा जाता है। मनके समान वेगशाली योगीन्द्र परशुरामने उस शिवलोकको देखा। वह महान् अद्भुत लोक उपमान और उपमेयसे रहित अर्थात् अनुपम, श्रेष्ठ योगीन्द्रों, सिद्धों, विद्याविशारदों, करोड़ों कल्पोंकी तपस्यासे पवित्र शरीरवाले पुण्यात्माओंसे निषेवित, मनोरथ पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षोंके समूहोंसे परिवेष्टित, असंख्य कामधेनुओंके समुदायोंसे सुशोभित, पारिजात-वृक्षोंकी वनावलीसे विशेष शोभायमान, दस हजार पुष्पोद्यानोंसे युक्त, सदा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न, बहुमूल्य मणियोंद्वारा रचित सुन्दर मणिवेदियों तथा सैकड़ों दिव्य राजमार्गोंद्वारा बाहर-भीतर विभूषित और नाना प्रकारकी पच्चीकारीसे युक्त उत्तम मणियोंके कलशोंसे उज्ज्वल दीखनेवाले अमूल्य मणियोंद्वारा निर्मित सौ करोड़ भवनोंसे युक्त था।

उसके रमणीय मध्यभागमें उन्हें शंकरजीका भवन दीख पड़ा। उस परम मनोहर भवनके चारों ओर बहुमूल्य मणियोंकी चहारदीवारीका निर्माण