भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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गणपतिखण्ड ४११

बन्धु है और न गुरुसे बढ़कर कोई अन्य पुरुष है। विद्या प्रदान करनेवालेके पुत्र और पत्नी भी निस्संदेह उसीके समान होते हैं। गुरुकी स्त्री और पुत्रकी परशुरामने अवहेलना कर दी है, उसीका सम्मार्जन करनेके लिये मैं तुम्हारे घर आया हूँ।

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! वहाँ भगवान् विष्णु शिवजीसे ऐसा कहकर दुर्गाको समझाते हुए सत्यके साररूप उत्तम वचन बोले।

विष्णुने कहा—देवि! मैं नीतियुक्त, वेदका तत्त्वरूप तथा परिणाममें सुखदायक वचन कहता हूँ, मेरे उस शुभ वचनको सुनो। गिरिराजकिशोरी! तुम्हारे लिये जैसे गणेश और कार्तिकेय हैं, निस्संदेह उसी प्रकार भृगुवंशी परशुराम भी हैं। सर्वज्ञे! इनके प्रति तुम्हारे अथवा शंकरजीके स्नेहमें भेदभाव नहीं है। अतः मातः! सबपर विचार करके जैसा उचित हो, वैसा करो। पुत्रके साथ पुत्रका यह विवाद तो दैवदोषसे घटित हुआ है। भला, दैवको मिटानेमें कौन समर्थ हो सकता है? क्योंकि दैव महाबली है। वत्से! देखो, तुम्हारे पुत्रका 'एकदन्त' नाम वेदोंमें विख्यात है। वरानने! सभी देव उसे नमस्कार करते हैं। ईश्वरि! सामवेदमें कहे हुए अपने पुत्रके नामाष्टक स्तोत्रको ध्यान देकर श्रवण करो। मातः! वह उत्तम स्तोत्र सम्पूर्ण विघ्नोंका नाशक है।

मातः! तुम्हारे पुत्रके गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज—ये आठ नाम हैं। इन आठों नामोंका अर्थ सुनो। शिवप्रिये! यह उत्तम स्तोत्र सभी स्तोत्रोंका सारभूत और सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाला है। 'ग' ज्ञानार्थवाचक और 'ण' निर्वाणवाचक है। इन दोनों (ग+ण)-के जो ईश हैं; उन परब्रह्म 'गणेश' को मैं प्रणाम करता हूँ।

'एक' शब्द प्रधानार्थक है और 'दन्त' बलवाचक है; अतः जिनका बल सबसे बढ़कर है; उन 'एकदन्त' को मैं नमस्कार करता हूँ। 'हे' दीनार्थवाचक और 'रम्ब' पालकका वाचक है; अतः दीनोंका पालन करनेवाले 'हेरम्ब' को मैं शीश नवाता हूँ। 'विघ्न' विपत्तिवाचक और 'नायक' खण्डनार्थक है, इस प्रकार जो विपत्तिके विनाशक हैं; उन 'विघ्ननायक' को मैं अभिवादन करता हूँ। पूर्वकालमें विष्णुद्वारा दिये गये नैवेद्यों तथा पिताद्वारा समर्पित अनेक प्रकारके मिष्टान्नोंके खानेसे जिनका उदर लम्बा हो गया है; उन 'लम्बोदर' की मैं वन्दना करता हूँ। जिनके कर्ण शूर्पाकार, विघ्न-निवारणके हेतु, सम्पदाके दाता और ज्ञानरूप हैं; उन 'शूर्पकर्ण' को मैं सिर झुकाता हूँ। जिनके मस्तकपर मुनिद्वारा दिया गया विष्णुका प्रसादरूप पुष्प वर्तमान है और जो गजेन्द्रके मुखसे युक्त हैं; उन 'गजवक्त्र' को मैं नमस्कार करता हूँ। जो गुह (स्कन्द)-से पहले जन्म लेकर शिव-भवनमें आविर्भूत हुए हैं तथा समस्त देवगणोंमें जिनकी अग्रपूजा होती है; उन 'गुहाग्रज' देवकी मैं वन्दना करता हूँ। दुर्गे! अपने पुत्रके नामोंसे संयुक्त इस उत्तम नामाष्टक स्तोत्रको पहले वेदमें देख लो, तब ऐसा क्रोध करो। जो इस नामाष्टक स्तोत्रका, जो नाना अर्थोंसे संयुक्त एवं शुभकारक है, नित्य तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह सुखी और सर्वत्र विजयी होता है। उसके पाससे विघ्न उसी प्रकार दूर भाग जाते हैं, जैसे गरुड़के निकटसे साँप। गणेश्वरकी कृपासे वह निश्चय ही महान् ज्ञानी हो जाता है, पुत्रार्थीको पुत्र और भार्याकी कामनावालेको उत्तम स्त्री मिल जाती है तथा महामूर्ख निश्चय ही विद्वान् और श्रेष्ठ कवि हो जाता है*।

(अध्याय ४४)


* विष्णुरुवाच—
गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम्। लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम्॥