भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 422
४१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

परशुरामको गौरीका स्तवन करनेके लिये कहकर विष्णुका वैकुण्ठ-गमन, परशुरामका पार्वतीकी स्तुति करना

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इस प्रकार पार्वतीको समझा-बुझाकर भगवान् विष्णु परशुरामसे हितकारक, तत्त्वस्वरूप, नीतिका साररूप और परिणाममें सुखदायक वचन बोले।

विष्णुने कहा— राम! तुमने अकल्याणकर मार्गपर स्थित हो क्रोधवश जो गणेशका दाँत तोड़ डाला है, इससे तुम श्रुतिके मतानुसार इस समय सचमुच ही अपराधी हो। अतएव मेरेद्वारा बतलाये हुए स्तोत्रसे देवश्रेष्ठ गणपतिका स्तवन करके पुनः काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा जगज्जननी दुर्गाकी स्तुति करो। ये जगदीश्वर श्रीकृष्णकी परा शक्ति एवं बुद्धिस्वरूपा हैं। इनके रुष्ट हो जानेपर तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो जायगी। ये सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। जगत् इन्हींसे शक्तिमान् हुआ है। यहाँतक कि जो प्रकृतिसे परे और निर्गुण हैं, वे श्रीकृष्ण भी इन्हींसे शक्तिशाली हुए हैं। इस शक्तिके बिना ब्रह्मा भी सृष्टिरचनामें समर्थ नहीं हैं। हम—ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। द्विजवर! पूर्वकालमें जब असुरोंने देवसमुदायको अपने अधीन कर लिया था, उस भयंकर समयमें ये सती सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे आविर्भूत हुई थीं। तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे इन्होंने असुरोंका वध करके देवताओंका पद उन्हें प्रदान किया। फिर दक्षकी तपस्याके कारण दक्षपत्नीके गर्भसे जन्म लिया। उस जन्ममें सती शंकरकी भार्या हुईं। पुनः पतिकी निन्दाके कारण उस शरीरको त्यागकर इन्होंने शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया। फिर तपस्या करके योगीन्द्रोंके गुरुके गुरु शंकरको पाया और श्रीकृष्णकी सेवासे श्रीकृष्णके अंशभूत गणपतिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। बालक! जिनका तुम नित्य ध्यान करते हो, क्या उन्हें नहीं जानते? वे भगवान् श्रीकृष्ण ही अपने अंशसे पार्वती-पुत्र होकर प्रकट हुए हैं। इसलिये जो मङ्गलस्वरूपा, कल्याणदायिनी, शिवपरायणा, मङ्गलकी कारण और मङ्गलकी अधीश्वरी हैं; उन शिवप्रिया दुर्गाकी तुम हाथ जोड़ सिर झुकाकर शिवाके स्तोत्रराजद्वारा, जिसे पूर्वकालमें त्रिपुरोंके भयंकर वधके अवसरपर ब्रह्माकी प्रेरणासे शंकरजीने स्तवन किया था, उससे स्तुति करो।


नामाष्टार्थं च पुत्रस्य शृणु मातर्हरप्रिये । स्तोत्राणां सारभूतं च सर्वविघ्नहरं परम् ॥
ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचकः । तयोरीशं परं ब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम् ॥
एकशब्दः प्रधानार्थो दन्तश्च बलवाचकः । बलं प्रधानं सर्वस्मादेकदन्तं नमाम्यहम् ॥
दीनार्थवाचको हेश्च रम्बः पालकवाचकः । दीनानां परिपालकं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ॥
विपत्तिवाचको विघ्नो नायकः खण्डनार्थकः । विपत्खण्डनकारकं नमामि विघ्ननायकम् ॥
विष्णुदत्तैश्च नैवेद्यैर्यस्य लम्बोदरं पुरा । पित्रा दत्तैश्च विविधैर्वन्दे लम्बोदरं च तम् ॥
शूर्पकारौ च यत्कर्णौ विघ्नवारणकारणौ । सम्पदौ ज्ञानरूपौ च शूर्पकर्णं नमाम्यहम् ॥
विष्णुप्रसादपुष्पं च यन्मूर्ध्नि मुनिदत्तकम् । तद् गजेन्द्रवक्त्रयुक्तं गजवक्त्रं नमाम्यहम् ॥
गुहस्याग्रे च जातोऽयमाविर्भूतो हरालये । वन्दे गुहाग्रजं देवं सर्वदेवाग्रपूजितम् ॥
एतन्नामाष्टकं दुर्गे नामभिः संयुतं परम् । पुत्रस्य पश्य वेदे च तदा कोपं तथा कुरु ॥
एतन्नामाष्टकं स्तोत्रं नानार्थसंयुक्तं शुभम् । त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स सुखी सर्वतो जयी ॥
ततो विघ्नाः पलायन्ते वैनतेयाद् यथोरगाः । गणेश्वरप्रसादेन महाज्ञानी भवेद् ध्रुवम् ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं भार्यार्थी विपुलां स्त्रियम् । महाजडः कवीन्द्रश्च विद्यावांश्च भवेद् ध्रुवम् ॥
(गणपतिखण्ड ४४ । ८५–९८)

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