भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

गणपतिखण्ड ४१३ नारद! यों कहकर भगवान् विष्णु शीघ्र ही वैकुण्ठको चले गये। श्रीहरिके चले जानेपर परशुराम हरिका स्मरण करके विष्णुप्रदत्त स्तोत्रद्वारा, जो सम्पूर्ण विघ्नोंका नाशक तथा धर्म-अर्थ- काम-मोक्षका कारण है; उन दुर्गाकी स्तुति करनेको उद्यत हुए। उन्होंने गङ्गाके शुभजलमें स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण किये। फिर अञ्जलि बाँधकर भक्तैश्वर गुरुको प्रणाम किया। फिर आचमन करके दुर्गाको सिर झुकाकर नमस्कार किया। उस समय भक्तिके कारण उनके कंधे झुके हुए थे, आँखोंमें आनन्दाश्रु छलक आये थे और सारा अङ्ग पुलकायमान हो गया था। परशुरामने कहा- प्राचीन कालकी बात है; गोलोकमें जब परिपूर्णतम श्रीकृष्ण सृष्टि- रचनाके लिये उद्यत हुए, उस समय उनके शरीरसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ था। तुम्हारी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी। तुम वस्त्र और अलंकारोंसे विभूषित थीं। शरीरपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ीका परिधान था। नव तरुण अवस्था थी। ललाटपर सिंदूरकी बेंदी शोभित हो रही थी। मालतीकी मालाओंसे मण्डित गुँथी हुई सुन्दर चोटी थी। बड़ा ही मनोहर रूप था। मुखपर मन्द मुस्कान थी। अहो ! तुम्हारी मूर्ति बड़ी सुन्दर थी, उसका वर्णन करना कठिन है। तुम मुमुक्षुओंको मोक्ष प्रदान करनेवाली तथा स्वयं महाविष्णुकी विधि हो। बाले ! तुम सबको मोहित कर लेनेवाली हो। तुम्हें देखकर श्रीकृष्ण उसी क्षण मोहित हो गये। तब तुम उनसे सम्भावित होकर सहसा मुस्कराती हुई भाग चलीं। इसी कारण सत्पुरुष तुम्हें 'मूलप्रकृति' ईश्वरी राधा कहते हैं। उस समय सहसा श्रीकृष्णने तुम्हें बुलाकर वीर्यका आधान किया। उससे एक महान् डिम्ब उत्पन्न हुआ। उस डिम्बसे महाविराट्की उत्पत्ति हुई, जिसके रोमकूपोंमें समस्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। फिर राधाके शृङ्गारक्रमसे तुम्हारा निःश्वास प्रकट हुआ। वह निःश्वास महावायु हुआ और वही विश्वको धारण करनेवाला विराट् कहलाया। तुम्हारे पसीनेसे विश्वगोलक पिघल गया। तब विश्वका निवासस्थान वह विराट् जलकी राशि हो गया। तब तुमने अपनेको पाँच भागोंमें विभक्त करके पाँच मूर्ति धारण कर ली। उनमें परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री मूर्ति है, उसे भविष्यवेत्ता लोग कृष्णप्राणाधिका 'राधा' कहते हैं। जो मूर्ति वेद-शास्त्रोंकी जननी तथा वेदाधिष्ठात्री है, उस शुद्धरूपा मूर्तिको मनीषीगण 'सावित्री' नामसे पुकारते हैं। जो शान्ति तथा शान्तरूपिणी ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री मूर्ति है, उस सत्त्वस्वरूपिणी शुद्ध मूर्तिको संतलोग 'लक्ष्मी' नामसे अभिहित करते हैं। अहो ! जो रागकी अधिष्ठात्री देवी तथा सत्पुरुषोंको पैदा करनेवाली है, जिसकी मूर्ति शुक्ल वर्णकी है, उस शास्त्रकी ज्ञाता मूर्तिको शास्त्रज्ञ 'सरस्वती' कहते हैं। जो मूर्ति बुद्धि, विद्या, समस्त शक्तिकी अधिदेवता, सम्पूर्ण मङ्गलोंकी मङ्गलस्थान, सर्वमङ्गलस्वरूपिणी और सम्पूर्ण मङ्गलोंकी कारण है, वही तुम इस समय शिवके भवनमें विराजमान हो। तुम्हीं शिवके समीप शिवा (पार्वती), नारायणके निकट लक्ष्मी और ब्रह्माकी प्रिया वेदजननी सावित्री और सरस्वती हो। जो परिपूर्णतम एवं परमानन्दस्वरूप हैं, उन रासेश्वर श्रीकृष्णकी तुम परमानन्दरूपिणी राधा हो। देवाङ्गनाएँ भी तुम्हारे कलांशकी अंशकलासे प्रादुर्भूत हुई हैं। सारी नारियाँ तुम्हारी विद्यास्वरूपा हैं और तुम सबकी कारणरूपा हो। अम्बिके ! सूर्यकी पत्नी छाया, चन्द्रमाकी भार्या सर्वमोहिनी रोहिणी, इन्द्रकी पत्नी शची, कामदेवकी पत्नी ऐश्वर्यशालिनी रति, वरुणकी पत्नी वरुणानी, वायुकी प्राणप्रिया स्त्री, अग्निकी प्रिया स्वाहा, कुबेरकी सुन्दरी भार्या, यमकी पत्नी सुशीला, नैर्ऋतकी जाया कैटभी, ईशानकी पत्नी शशिकला,