भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

४१४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मनुकी प्रिया शतरूपा, कर्दमकी भार्या देवहूति, वसिष्ठकी पत्नी अरुन्धती, देवमाता अदिति, अगस्त्य मुनिकी प्रिया लोपामुद्रा, गौतमकी पत्नी अहल्या, सबकी आधाररूपा वसुन्धरा, गङ्गा, तुलसी तथा भूतलकी सारी श्रेष्ठ सरिताएँ—ये सभी तथा इनके अतिरिक्त जो अन्य स्त्रियाँ हैं, वे सभी तुम्हारी कलासे उत्पन्न हुई हैं।

तुम मनुष्योंके घरमें गृहलक्ष्मी, राजाओंके भवनोंमें राजलक्ष्मी, तपस्वियोंकी तपस्या और ब्राह्मणोंकी गायत्री हो। तुम सत्पुरुषोंके लिये सत्त्वस्वरूप और दुष्टोंके लिये कलहकी अङ्कुर हो। निर्गुणकी ज्योति और सगुणकी शक्ति तुम्हीं हो। तुम सूर्यमें प्रभा, अग्निमें दाहिका-शक्ति, जलमें शीतलता और चन्द्रमामें शोभा हो। भूमिमें गन्ध और आकाशमें शब्द तुम्हारा ही रूप है। तुम भूख-प्यास आदि तथा प्राणियोंकी समस्त शक्ति हो। संसारमें सबकी उत्पत्तिकी कारण, साररूपा, स्मृति, मेधा, बुद्धि अथवा विद्वानोंकी ज्ञानशक्ति तुम्हीं हो। श्रीकृष्णने शिवजीको कृपापूर्वक सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रसविनी जो शुभ विद्या प्रदान की थी, वह तुम्हीं हो; उसीसे शिवजी मृत्युञ्जय हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली जो त्रिविध शक्तियाँ हैं, उनके रूपमें तुम्हीं विद्यमान हो; अतः तुम्हें नमस्कार है। जब मधु-कैटभके भयसे डरकर ब्रह्मा काँप उठे थे, उस समय जिनकी स्तुति करके वे भयमुक्त हुए थे; उन देवीको मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मधु-कैटभके युद्धमें जगत्के रक्षक ये भगवान् विष्णु जिन परमेश्वरीका स्तवन करके शक्तिमान् हुए थे; उन दुर्गाको मैं नमस्कार करता हूँ। त्रिपुरके महायुद्धमें रथसहित शिवजीके गिर जानेपर सभी देवताओंने जिनकी स्तुति की थी; उन दुर्गाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनका स्तवन करके वृषरूपधारी विष्णुद्वारा उठाये गये स्वयं शम्भुने त्रिपुरका संहार किया था; उन दुर्गाको मैं अभिवादन करता हूँ। जिनकी आज्ञासे निरन्तर वायु बहती है, सूर्य तपते हैं, इन्द्र वर्षा करते हैं और अग्नि जलाती है; उन दुर्गाको मैं सिर झुकाता हूँ। जिनकी आज्ञासे काल सदा वेगपूर्वक चक्कर काटता रहता है और मृत्यु जीव-समुदायमें विचरती रहती है; उन दुर्गाको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके आदेशसे सृष्टिकर्ता सृष्टिकी रचना करते हैं, पालनकर्ता रक्षा करते हैं और संहर्ता समय आनेपर संहार करते हैं; उन दुर्गाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके बिना स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण, जो ज्योतिःस्वरूप एवं निर्गुण हैं, सृष्टि-रचना करनेमें समर्थ नहीं होते; उन देवीको मेरा नमस्कार है। जगज्जननी! रक्षा करो, रक्षा करो; मेरे अपराधको क्षमा कर दो। भला, कहीं बच्चेके अपराध करनेसे माता कुपित होती है।

इतना कहकर परशुराम उन्हें प्रणाम करके रोने लगे। तब दुर्गा प्रसन्न हो गयीं और शीघ्र ही उन्हें अभयका वरदान देती हुई बोलीं—'हे वत्स! तुम अमर हो जाओ। बेटा! अब शान्ति धारण करो। शिवजीकी कृपासे सदा सर्वत्र तुम्हारी विजय हो। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सदा

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