भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 440

४३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण किशोर थी। शरीरकी कान्ति सुन्दर एवं श्याम थी। वे सोनेका बेंत हाथमें लिये रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। पाँच लाख गोपोंका समूह उनकी शोभा बढ़ा रहा था। उनसे पूछकर देवतालोग तीसरे उत्तम द्वारपर गये, जो दूसरेसे भी अधिक सुन्दर, विचित्र तथा मणियोंके तेजसे प्रकाशित था। नारद! वहाँ द्वारकी रक्षामें नियुक्त सूर्यभानु नामक द्वारपाल दिखायी दिये, जो दो भुजाओंसे युक्त, मुरलीधारी, किशोर, श्याम एवं सुन्दर थे। उनके दोनों गालोंपर दो मणिमय कुण्डल झलमला रहे थे। रत्नकुण्डलधारी सूर्यभानु श्रीराधा और श्रीकृष्णके परम प्रिय एवं श्रेष्ठ सेवक थे। वे सम्राट्की भाँति नौ लाख गोपोंसे घिरे रहते थे। उनसे पूछकर देवतालोग चौथे द्वारपर गये, जो उन सभी द्वारोंसे विलक्षण, रमणीय तथा मणियोंकी दिव्य दीप्तिसे उद्दीप्त दिखायी देता था। अद्भुत एवं विचित्र रत्नसमूहसे जटित होनेके कारण उस द्वारकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। उसकी रक्षाके लिये ब्रजराज वसुभानु नियुक्त थे। देवतालोग उनसे मिले। वे किशोर-अवस्थाके सुन्दर एवं श्रेष्ठ पुरुष थे। हाथमें मणिमय दण्ड लिये हुए थे। रमणीय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर बैठे थे। पके बिम्बफलके समान लाल ओष्ठ और मन्द-मन्द मुस्कानसे वे अत्यन्त मनोहर दिखायी देते थे। देवतालोग उनसे पूछकर पाँचवें द्वारपर गये। वह हीरेकी दीवारोंपर अङ्कित विचित्र चित्रोंसे अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था। वहाँ देवभानु नामक द्वारपाल मिले, जो रत्नमय आभूषण धारण करके मनोहर सिंहासनपर आसीन थे। उनके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था और वे रत्नोंके हारसे अलंकृत थे। कदम्बोंके पुष्पसे सुशोभित, उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे प्रकाशित तथा चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे चर्चित थे। सम्राटोंके समान दस लाख प्रजा उनके साथ थी। हाथमें बेंत धारण करनेवाले द्वारपाल देवभानुसे पूछकर देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े। सामने छठा द्वार था। उसकी विलक्षण शोभा थी। चित्रोंकी श्रेणियोंसे वह द्वार उद्भासित हो रहा था। उसकी दोनों दीवारें वज्रमणि (हीरे)-की बनी थीं और फूलोंकी मालाओंसे सजायी गयी थीं। उस द्वारपर ब्रजराज शक्रभानु नियुक्त थे। देवतालोग उनसे मिले। वे नाना प्रकारके अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न थे। उनके साथ दस लाख प्रजाएँ थीं। चन्दन-पल्लवसे युक्त उनके कपोल कुण्डलोंकी प्रभासे उद्भासित थे। उनसे आज्ञा लेकर देवतालोग तुरंत ही सातवें द्वारपर जा पहुँचे। उसमें नाना प्रकारके चित्र अङ्कित थे। वह पिछले छहों द्वारोंसे अत्यन्त विलक्षण था। वहाँ द्वारपालके पदपर श्रीहरिके परम प्रिय रत्नभानु नियुक्त थे, जिनका सारा अङ्ग चन्दनसे अभिषिक्त था। वे पुष्पोंकी मालासे विभूषित थे। मणि-रत्ननिर्मित मनोहर एवं रमणीय भूषण उनकी शोभा बढ़ाते थे। बारह लाख गोप आज्ञाके अधीन रहकर राजाधिराजकी भाँति उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला था। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। उनके हाथमें बेंतकी छड़ी शोभा पाती थी। वे तीनों देवेश्वर उनसे बातचीत करके प्रसन्नतापूर्वक आठवें द्वारपर गये। वह पूर्वोक्त सातों द्वारोंसे विलक्षण एवं विचित्र शोभाशाली था। वहाँ उन्होंने सुपार्श्व नामक मनोहर द्वारपालको देखा, जो मन्द मुस्कराहटके साथ बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। वे भालदेशमें धारित चन्दनके तिलकसे अत्यन्त उद्भासित दिखायी देते थे। उनके ओठ बन्धुजीवपुष्प (दुपहरिया)-के समान लाल थे। रत्नोंके कुण्डल उनके गण्डस्थलको अलंकृत किये हुए थे। वे समस्त अलंकारोंकी शोभासे सम्पन्न थे। रत्नमय दण्ड धारण करते थे और उनके साथ बारह लाख गोप थे। वहाँसे