ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३१ अनुमति मिलनेपर वे देवता शीघ्र ही नवें अभीष्ट द्वारपर गये। वहाँ हीरे आदि उत्तम रत्नोंकी चार वेदियाँ बनी थीं। वह द्वार अपूर्व चित्रोंसे सज्जित तथा मालाओंकी जालीसे विभूषित था। वहाँ सुन्दर आकारवाले सुबल नामक द्वारपाल दृष्टिगोचर हुए, जो भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे भूषित, भूषणके योग्य तथा मनोहर थे। उनके साथ बारह लाख व्रजवासी थे। दण्डधारी सुबलसे पूछकर देवताओंने तत्काल दूसरे द्वारको प्रस्थान किया। उस विलक्षण दसवें द्वारको देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। मुने! वहाँका सब कुछ अनिर्वचनीय, अदृष्ट और अश्रुत था- वैसा दृश्य कभी देखने और सुननेमें भी नहीं आया था। वहाँ सुन्दर सुदामा नामक गोप द्वारपालके पदपर प्रतिष्ठित थे। सुदामाका रूप श्रीकृष्णके समान ही मनोहर तथा अवर्णनीय था। उनके साथ बीस लाख गोपोंका समूह रहता था। दण्डधारी सुदामाका दर्शनमात्र करके देवतालोग दूसरे द्वारपर चले गये। वह ग्यारहवाँ द्वार अत्यन्त विचित्र और अद्भुत था। वहाँ सुन्दर चित्र अङ्कित थे। वहाँके द्वारपाल व्रजराज श्रीदामा थे, जिन्हें राधिकाजी अपने पुत्रके समान मानती थीं। वे पीताम्बरसे विभूषित थे, बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित रम्य सिंहासनपर आसीन थे और अमूल्य रत्नाभरण उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनका रूप बड़ा ही मनोहर था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उनका शृङ्गार हुआ था। वे अपने कपोलोंके योग्य कानोंमें उत्तम रत्नमय कुण्डल धारण करके प्रकाशित हो रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा रचित विचित्र मुकुट उनके मस्तककी शोभा बढ़ा रहा था। प्रफुल्ल मालती-पुष्पकी मालाओंसे उनके सारे अङ्ग विभूषित थे। करोड़ों गोपोंसे घिरे होनेके कारण राजाधिराजसे भी अधिक उनकी शोभा होती थी। उनकी अनुमति ले देवतालोग प्रसन्नतापूर्वक बारहवें द्वारपर गये, जहाँ बहुमूल्य रत्नोंकी बनी हुई बहुत-सी वेदिकाएँ प्रकाशित हो रही थीं। वह विचित्र द्वार सबके लिये दुर्लभ, अदृश्य और अश्रुत था। वज्रमयी भीतोंपर अङ्कित चित्रोंके कारण उस द्वारकी सुन्दरता और मनोहरता बहुत बढ़ गयी थी। देवताओंने देखा बारहवें द्वारकी रक्षामें सुन्दरी गोपाङ्गनाएँ नियुक्त हुई हैं। वे सब- की-सब रूप-यौवनसे सम्पन्न, रत्नाभरणोंसे विभूषित, पीताम्बरधारिणी तथा बँधे हुए केश-कलापके भारसे सुशोभित थीं। उनके सारे अङ्ग सुस्निग्ध मालतीकी मालाओंसे अलंकृत थे। रत्नोंके बने हुए कंगन, बाजूबंद तथा नूपुर उन-उन अङ्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। उनके दोनों कपोल दिव्य रत्नमय कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे। वे चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे अपना शृङ्गार किये हुए थीं। वहाँ सौ कोटि गोपियोंमें एक श्रेष्ठ गोपी थी, जो श्रीहरिको भी परम प्रिय थी। उन करोड़ों गोपिकाओंको देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। मुने! उन सब गोपियोंसे अनुमति ले वे देवता प्रसन्नतापूर्वक दूसरे द्वारपर गये। इस तरह क्रमशः तीन द्वारोंपर उन्होंने देखा-श्रेष्ठ और अत्यन्त मनोहर गोपाङ्गनाएँ उनकी रक्षा कर रही हैं। वे सुन्दरियोंमें भी सुन्दरी, रमणीया, धन्या, मान्या और शोभाशालिनी हैं। सब-की-सब सौभाग्यमें बढ़ी-चढ़ी तथा श्रीराधिकाकी प्रिया हैं। सुरम्य भूषणोंसे भूषित हुई उन गोपसुन्दरियोंके अङ्गोंमें नूतन यौवनका अंकुर प्रकट हुआ है। इस प्रकार वे तीनों द्वार स्वप्नकालिक अनुभवके समान अद्भुत, अश्रुत, अदृष्टपूर्व, अतिरमणीय और विद्वानोंके द्वारा भी अवर्णनीय थे। उन सबको देखकर और उन-उन गोपाङ्गनाओंसे बातचीत करके आश्चर्यचकित हुए वे तीनों देवेश्वर सोलहवें मनोहर द्वारपर गये, जो श्रीराधिकाके अन्तःपुरका द्वार था। वह सब द्वारोंमें प्रधान तथा केवल गोपाङ्गनागणोंद्वारा ही रक्षणीय था। श्रीराधाकी जो तैंतीस समयवयस्का सखियाँ थीं, वे ही इस