भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 448

४३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


श्रीकृष्णने कहा—तुम सब लोग इस समय मेरे धाममें पधारे हो। यहाँ तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है। शिवके आश्रयमें रहनेवाले लोगोंका तो कुशल पूछना उचित नहीं है। यहाँ आकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। मेरे रहते तुम्हें क्या चिन्ता है? मैं समस्त जीवोंके भीतर विराजमान हूँ; परंतु स्तुतिसे ही प्रत्यक्ष होता हूँ। तुम्हारा जो अभिप्राय है, वह सब मैं निश्चितरूपसे जानता हूँ। देवताओ! शुभ-अशुभ जो भी कर्म है, वह समयपर ही होगा। बड़ा और छोटा—सब कार्य कालसे ही सम्पन्न होता है। वृक्ष अपने-अपने समयपर ही सदा फूलते और फलते हैं। समयपर ही उनके फल पकते हैं और समयपर ही वे कच्चे फलोंसे युक्त होते हैं। सुख-दुःख, सम्पत्ति-विपत्ति, शोक-चिन्ता तथा शुभ-अशुभ—सब अपने-अपने कर्मोंके फल हैं और सभी समयपर ही उपस्थित होते हैं। तीनों लोकोंमें न तो कोई किसीका प्रिय है और न अप्रिय ही है। समय आनेपर कार्यवश सभी लोग अप्रिय अथवा प्रिय होते हैं। तुमलोगोंने देखा है, पृथ्वीपर बहुत-से राजा और मनु हुए और वे सभी अपने-अपने कर्मोंके फलके परिपाकसे कालके अधीन हो गये। तुमलोगोंका यहाँ गोलोकमें जो एक क्षण व्यतीत हुआ है, उतनेमें ही पृथ्वीपर सात मन्वन्तर बीत गये। सात इन्द्र समाप्त हो गये। इस समय आठवें इन्द्र चल रहे हैं। इस प्रकार मेरा कालचक्र दिन-रात भ्रमण करता रहता है। इन्द्र, मनु तथा राजा सभी लोग कालके वशीभूत हो गये। उनकी कीर्ति, पृथ्वी, पुण्य और पापकी कथामात्र शेष रह गयी है। इस समय भी भूमिपर बहुत-से राजा दुष्ट और भगवन्निन्दक हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। परंतु समयानुसार वे सब-के-सब कालान्तक यमके ग्रास हो जायँगे। यह काल इस समय भी मेरी आज्ञासे उपस्थित है। वायु मेरी आज्ञा मानकर ही निरन्तर बहती रहती है। मेरी आज्ञासे ही आग जलती और सूर्य तपते हैं। देवताओ! मेरी आज्ञासे ही सब शरीरोंमें रोग निवास करते हैं। समस्त प्राणियोंमें मृत्युका संचार होता है तथा वे समस्त जलधर वर्षा करते हैं। मेरे शासनसे ही ब्राह्मण ब्राह्मणत्वमें, तपोधन तपस्यामें, ब्रह्मर्षि ब्रह्ममें और योगी योगमें निष्ठा रखते हैं। वे सब-के-सब मेरे भयसे भीत होकर ही स्वधर्म-कर्मके पालनमें तत्पर हैं। जो मेरे भक्त हैं, वे सदा निःशङ्क रहते हैं; क्योंकि वे कर्मका निर्मूलन करनेमें समर्थ हैं।

देवताओ! मैं कालका भी काल हूँ। विधाताका भी विधाता हूँ। संहारकारीका भी संहारक तथा पालकका भी पालक परात्पर परमेश्वर हूँ। मेरी आज्ञासे ये शिव संहार करते हैं; इसलिये इनका नाम 'हर' है। तुम मेरे आदेशसे सृष्टिके लिये उद्यत रहते हो; इसलिये 'विश्वस्रष्टा' कहलाते हो और धर्मदेव रक्षाके कारण ही 'पालक' कहलाते हैं। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सबका ईश्वर मैं ही हूँ। मैं ही कर्मफलका दाता तथा कर्मोंका निर्मूलन करनेवाला हूँ। मैं जिनका संहार करना चाहूँ, उनकी रक्षा कौन कर सकता है? तथा मैं जिनका पालन करूँ, उनको मारनेवाला भी कोई नहीं है। मैं सबका सृजन, पालन और संहार करता हूँ। परंतु मेरे भक्त नित्यदेही हैं। उनके संहारमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। भक्त सदा मेरे पीछे चलते हैं और मेरे चरणोंकी आराधनामें तत्पर रहते हैं; अतः मैं भी सदा भक्तोंके निकट उनकी रक्षाके लिये मौजूद रहता हूँ। ब्रह्माण्डमें सभी नष्ट होते और बारंबार जन्म लेते हैं; परंतु मेरे भक्तोंका नाश नहीं होता है। वे सदा निःशङ्क और निरापद रहते हैं। इसीलिये समस्त विद्वान् पुरुष मेरे दास्यभावकी अभिलाषा रखते हैं; दूसरे किसी वरकी नहीं। जो मुझसे दास्यभावकी याचना करते हैं; वे धन्य हैं। दूसरे सब-के-सब वञ्चित हैं। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, भय और यमयातना—ये सारे कष्ट दूसरे-