ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३७ उनका मध्यभाग अलंकृत था। उत्तम रत्नोंके हार, बाजूबंद और कंगनसे वे विभूषित थीं। उत्तम रत्नोंके द्वारा रचित कुण्डलोंसे उनके कपोल उद्दीप्त हो रहे थे। कानोंमें श्रेष्ठ मणियोंके कर्णभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। पक्षिराज गरुड़की चोंचके समान नुकीली नासिकामें गजमुक्ताकी बुलाक शोभा दे रही थी। उनके घुंघराले बालोंकी वेणीमें मालतीकी माला लपेटी हुई थी। वक्षःस्थलमें अनेक कौस्तुभमणियोंकी प्रभा फैली हुई थी। पारिजातके फूलोंकी माला धारण करनेसे उनकी रूपराशि परम उज्ज्वल जान पड़ती थी। उनके हाथकी अंगुलियाँ रत्नोंकी अँगूठियोंसे विभूषित थीं। दिव्य शङ्खके बने हुए विचित्र रागविभूषित रमणीय भूषण उन्हें विभूषित कर रहे थे। वे शङ्खभूषण महीन रेशमी डोरेमें गुँथे हुए थे। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वकी बनी हुई गुटिकाको लाल डोरेमें गूंथकर उसके द्वारा उन्होंने अपने-आपको सज्जित किया था। तपाये हुए सुवर्णके समान अङ्गकान्तिको सुन्दर वस्त्रसे आच्छादित करके वे बड़ी शोभा पा रही थीं। उनका शरीर अत्यन्त मनोहर था। नितम्बदेश और श्रोणिभागके सौन्दर्यसे वे और भी सुन्दरी दिखायी देती थीं। वे समस्त आभूषणोंसे विभूषित थीं और समस्त आभूषण उनके सौन्दर्यसे विभूषित थे। उन श्रेष्ठ परमेश्वर और सुन्दरी परमेश्वरीका दर्शन करके सब देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके सम्पूर्ण मनोरथ पूरे हो गये थे। अतः उन सब देवताओंने पुनः भगवान्की स्तुति आरम्भ की— ब्रह्मोवाच तव चरणसरोजे मन्मनश्चञ्चरीको भ्रमतु सततमिश प्रेमभक्त्या सरोजे । भवनमरणरोगात् पाहि शान्त्यौषधेन सुदृढसुपरिपक्वां देहि भक्तिं च दास्यम् ॥ ब्रह्माजी बोले—परमेश्वर ! मेरा चित्तरूपी चञ्चरीक (भ्रमर) आपके चरणारविन्दमें निरन्तर प्रेम-भक्तिपूर्वक भ्रमण करता रहे। शान्तिरूपी औषध देकर मेरी जन्म-मरणके रोगसे रक्षा कीजिये तथा मुझे सुदृढ़ एवं अत्यन्त परिपक्व भक्ति और दास्यभाव दीजिये। शङ्कर उवाच भवजलधिनिमग्नश्चित्तमीनो मदीयो भ्रमति सततमस्मिन् घोरसंसारकूपे । विषयमतिविनिन्द्यं सृष्टिसंहाररूप- मपनय तव भक्तिं देहि पादारविन्दे ॥ भगवान् शंकरने कहा—प्रभो! भवसागरमें डूबा हुआ मेरा चित्तरूपी मत्स्य सदा ही इस घोर संसाररूपी कूपमें चक्कर लगाता रहता है। सृष्टि और संहार यही इसका अत्यन्त निन्दनीय विषय है। आप इस विषयको दूर कीजिये और अपने चरणारविन्दोंकी भक्ति दीजिये। धर्म उवाच तव निजजनसाद्धं सङ्गमो मे सदैव भवतु विषयबन्धच्छेदने तीक्ष्णखड्गः। तव चरणसरोजे स्थानदानैकहेतु- र्जनुषि जनुषि भक्तिं देहि पादारविन्दे ॥ धर्म बोले—मेरे ईश्वर ! आपके आत्मीयजनों (भक्तों)-के साथ मेरा सदा समागम होता रहे, जो विषयरूपी बन्धनको काटनेके लिये तीखी तलवारका काम देता है तथा आपके चरणारविन्दोंमें स्थान दिलानेका एकमात्र हेतु है। आप जन्म- जन्ममें मुझे अपने चरणारविन्दोंकी भक्ति प्रदान कीजिये। भगवान् नारायण कहते हैं—इस प्रकार स्तुति करके पूर्णमनोरथ हुए वे तीनों देवता कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले श्रीराधावल्लभके सामने खड़े हो गये। देवताओंकी यह स्तुति सुनकर कृपानिधान श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कान खिल उठी। वे उनसे हितकर एवं सत्य वचन बोले।