भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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४३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

देवताओंद्वारा तेजःपुञ्जमें श्रीकृष्ण और राधाके दर्शन तथा स्तवन, श्रीकृष्णद्वारा देवताओंका स्वागत तथा उन्हें आश्वासन-दान, भगवद्भक्तके महत्त्वका वर्णन, श्रीराधासहित गोप-गोपियोंको व्रजमें अवतीर्ण होनेके लिये श्रीहरिका आदेश, सरस्वती और लक्ष्मीसहित वैकुण्ठवासी नारायणका तथा क्षीरशायी विष्णुका शुभागमन, नारायण और विष्णुका श्रीकृष्णके स्वरूपमें लीन होना, संकर्षण तथा पुत्रोंसहित पार्वतीका आगमन, देवताओं और देवियोंको पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करनेके लिये प्रभुका आदेश, किस देवताका कहाँ और किस रूपमें जन्म होगा—इसका विवरण, श्रीराधाकी चिन्ता तथा श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देते हुए अपनी और उनकी एकताका प्रतिपादन करना, फिर श्रीहरिकी आज्ञासे राधा और गोप-गोपियोंका नन्द-गोकुलमें गमन

श्रीनारायण कहते हैं—मुने! उस तेजः-पुञ्जके सामने ध्यान और स्तुति करके खड़े हुए उन देवताओंने उस तेजोराशिके मध्यभागमें एक कमनीय शरीरको देखा, जो सजल जलधरके समान श्याम-कान्तिसे युक्त एवं परम मनोहर था। उसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसका रूप परमानन्दजनक तथा त्रिलोकीके चित्तको मोह लेनेवाला था। उसके दोनों गालोंपर मकराकार कुण्डल जगमगा रहे थे। उत्तम रत्नोंके बने हुए नूपुरोंसे उसके चरणारविन्दोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। अग्निशुद्ध दिव्य पीताम्बरसे उस श्रीविग्रहकी अपूर्व शोभा हो रही थी। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वेच्छा और कौतूहलवश श्रेष्ठ मणियों और रत्नोंके सारतत्त्वसे रचा गया हो। मनोरञ्जनकी सामग्री मुरलीसे संलग्न बिम्बसदृश अरुण अधरोंके कारण उसके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वह शुभ दृष्टिसे देखता और भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर जान पड़ता था। उत्तम रत्नोंकी गुटिकासे युक्त किवाड़-जैसा विशाल वक्षःस्थल प्रकाशित हो रहा था। कौस्तुभमणिके कारण बढ़े हुए तेजसे वह देदीप्यमान दिखायी देता था।

उसी तेजःपुञ्जमें देवताओंने मनोहर अङ्गवाली श्रीराधाको भी देखा। वे मन्द मुस्कराहटके साथ अपनी ओर देखते हुए प्रियतमको तिरछी चितवनसे निहार रही थीं। मोतियोंकी पाँतको तिरस्कृत करनेवाली दन्तावली उनके मुखकी शोभा बढ़ा रही थी। उनका प्रसन्न मुखारविन्द मन्द हास्यकी छटासे सुशोभित था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी छबिको लज्जित कर रहे थे। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको निन्दित करनेवाले मुखके कारण वे बड़ी मनोहारिणी जान पड़ती थीं। दोपहरियाके फूलकी शोभाको चुरानेवाले उनके लाल-लाल अधर और ओष्ठ बड़े मनोहर थे तथा वे बहुत सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए थीं। उनके युगल चरणारविन्दोंमें झनकारते हुए मञ्जीर शोभा दे रहे थे। नखोंकी पंक्ति श्रेष्ठ मणिरत्नोंकी प्रभाको छीने लेती थी। कुंकुमकी आभाको तिरस्कृत कर देनेवाले चरणतलके स्वाभाविक रागसे वे सुशोभित थीं। बहुमूल्य रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए पाशकोंकी श्रेणी उन्हें विभूषित कर रही थी। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करके वे अत्यन्त उद्भासित हो रही थीं। श्रेष्ठ महामणियोंके सारतत्त्वसे बनी हुई काञ्चीसे

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