भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 452

४४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उन दोनों देवेश्वरोंको निकट आया देख वे सब देवता उठकर खड़े हो गये। उन्होंने आशीर्वाद दिया और दोनोंको अपने पास बिठा लिया। देवता बड़ी प्रसन्नताके साथ गणेश और कार्तिकेयके साथ उत्तम वार्तालाप करने लगे। उस समय देवता और देवी उस सभामें श्रीहरिके सामने बैठ गये। उन्हें देख बहुसंख्यक गोप और गोपियाँ आश्चर्यसे चकित हो रही थीं। तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट खेलने लगी। वे लक्ष्मीसे बोले—'सनातनी देवि! तुम नाना रत्नोंसे सम्पन्न भीष्मकके राजभवनमें जाओ और वहाँ विदर्भदेशकी महारानीके उदरसे जन्म धारण करो। साध्वी देवि! मैं स्वयं कुण्डिनपुरमें जाकर तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा।'

वे रमा आदि देवियाँ पार्वतीको देखकर शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने ईश्वरीको रमणीय रत्न-सिंहासनपर बिठाया। विप्रवर नारद! पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती—ये तीनों देवियाँ परस्पर यथोचित कुशल-प्रश्न करके वहाँ एक आसनपर बैठीं। वे प्रेमपूर्वक गोप-कन्याओंसे वार्तालाप करने लगीं। कुछ गोपियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके निकट बैठ गयीं। इसी समय जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ पार्वतीसे कहा—'सृष्टि और संहार करनेवाली कल्याणमयी महामायास्वरूपिणी देवि! शुभे! तुम अंशरूपसे नन्दके ब्रजमें जाओ और वहाँ नन्दके घर यशोदाके गर्भमें जन्म धारण करो। मैं भूतलपर गाँव-गाँवमें तुम्हारी पूजा करवाऊँगा। समस्त भूमण्डलमें, नगरों और वनोंमें मनुष्य वहाँकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें भक्तिभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे और आनन्दपूर्वक नाना प्रकारके द्रव्य तथा दिव्य उपहार तुम्हें अर्पित करेंगे। शिवे! तुम ज्यों ही भूतलका स्पर्श करोगी, त्यों ही मेरे पिता वसुदेव यशोदाके सूतिकागारमें जाकर मुझे वहाँ स्थापित कर देंगे और तुम्हें लेकर चले जायेंगे। कंसका साक्षात्कार होनेमात्रसे तुम पुनः शिवके समीप चली आओगी और मैं भूतलका भार उतारकर अपने धाममें आ जाऊँगा।'

[ऐसा कहकर तुरंत ही छः मुखवाले स्कन्दसे श्रीकृष्ण बोले]—वत्स सुरेश्वर! तुम अंशरूपसे भूतलपर जाओ और जाम्बवतीके गर्भसे जन्म ग्रहण करो। सब देवता अपने अंशसे पृथ्वीपर जायँ और जन्म लें। मैं निश्चय ही पृथ्वीका भार हरण करूँगा।

नारद! ऐसा कहकर राधिकानाथ श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठे। फिर देवता, देवियाँ, गोप और गोपियाँ भी बैठ गयीं। इसी बीचमें ब्रह्माजी श्रीहरिके सामने उठकर खड़े हो गये और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उन जगदीश्वरसे बोले।

**ब्रह्माजीने कहा—**प्रभो! इस सेवकके निवेदनपर ध्यान दीजिये। महाभाग! आज्ञा कीजिये कि भूतलपर किसके लिये कहाँ स्थान होगा। स्वामी ही सदा सेवकोंका भरण-पोषण और उद्धार करनेवाला है। सेवक वही है जो सदा भक्तिभावसे प्रभुकी आज्ञाका पालन करता है। कौन देवता किस रूपसे अवतार लेंगे? देवियाँ भी किस कलासे अवतीर्ण होंगी? भूतलपर कहाँ किसका निवास-स्थान होगा? और वह किस नामसे ख्याति प्राप्त करेगा?

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने इस प्रकार उत्तर दिया।

**श्रीकृष्ण बोले—**ब्रह्मन्! जिसके लिये जहाँ स्थान होगा, वह विधिवत् बता रहा हूँ, सुनो। कामदेव रुक्मिणीके पुत्र होंगे तथा शम्बरासुरके घरमें जो छायारूपसे स्थित है, वह सती मायावतीके नामसे प्रसिद्ध रति उनकी पत्नी होगी। तुम उन्हीं रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके पुत्र होओगे और तुम्हारा नाम अनिरुद्ध होगा। भारती शोणितपुरमें जाकर बाणासुरकी पुत्री होगी। जगदीश्वर अनन्त देवकीके गर्भसे आकृष्ट हो