भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 453

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४३

रोहिणीके गर्भसे जन्म लेंगे। मायाद्वारा उस गर्भका संकर्षण होनेसे उनका नाम 'संकर्षण' होगा। सूर्यतनया यमुना गङ्गाके अंशके साथ भूतलपर कालिन्दी नामवाली पटरानी होंगी। तुलसी आधे अंशसे राजकन्या लक्ष्मणाके रूपमें अवतीर्ण होंगी। वेदमाता सावित्री नग्नजित्की पुत्री सती सत्याके नामसे प्रसिद्ध होंगी। वसुधा सत्यभामा और देवी सरस्वती शैव्या होंगी। रोहिणी राजकन्या मित्रविन्दा होंगी। सूर्यपत्नी संज्ञा अपनी कलासे जगद्गुरुकी पत्नी रत्नमाला होंगी। स्वाहा एक अंशसे सुशीलाके रूपमें अवतीर्ण होंगी। ये रुक्मिणी आदि नौ स्त्रियाँ हुईं। इसके अतिरिक्त पार्वती अपने आधे अंशसे जाम्बवती होंगी। ये दस पटरानियाँ बतायी गयी हैं।

समस्त देवताओंके अंश भूतलपर जायँ। ब्रह्मन्! वे राजकुमार होकर युद्धमें मेरे सहायक बनेंगे। कमलाकी कलासे सोलह हजार राजकन्याएँ प्रकट होंगी, वे सब-की-सब मेरी रानियाँ बनेंगी। वे धर्मदेव अंशरूपसे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर होंगे। वायुके अंशसे भीमसेनका और इन्द्रके अंशसे साक्षात् अर्जुनका प्रादुर्भाव होगा। अश्विनीकुमारोंके अंशसे नकुल और सहदेव प्रकट होंगे। सूर्यका अंश वीरवर कर्ण होगा और साक्षात् यमराज विदुर होंगे। कलिका अंश दुर्योधन, समुद्रका अंश शान्तनु, शंकरका अंश अश्वत्थामा और अग्निका अंश द्रोण होगा। चन्द्रमाका अंश अभिमन्युके रूपमें प्रकट होगा। स्वयं वसु देवता भीष्म होंगे। कश्यपके अंशसे वसुदेव और अदितिके अंशसे देवकी होंगी। वसुके अंशसे नन्द-गोपका प्रादुर्भाव होगा। वसुकी पत्नी यशोदा होंगी। कमलाके अंशसे द्रौपदी होंगी, जिनका प्रादुर्भाव यज्ञकुण्डसे होगा। अग्निके अंशसे महाबली धृष्टद्युम्नका जन्म होगा। शतरूपाके अंशसे सुभद्रा होंगी, जिनका जन्म देवकीके गर्भसे होगा। देवतालोग भारहारी होकर अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हों। इसी प्रकार देवपत्नियां भी अपनी कलासे भूतलपर पधारें।

नारद! ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण चुप हो गये। वह सारा विवरण सुनकर प्रजापति ब्रह्मा वहाँ अपने स्थानपर जा बैठे। देवर्षे! श्रीकृष्णके वामभागमें वाग्देवी सरस्वती थीं। दाहिने भागमें लक्ष्मी थीं। अन्य सब देवता और पार्वतीदेवी सामने थीं। गोप और गोपियाँ भी उनके सम्मुख ही बैठी थीं। श्रीराधा श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलमें विराजमान थीं। इसी समय व्रजेश्वरी राधा अपने प्रियतमसे बोलीं।

राधिकाने कहा—नाथ! मैं कुछ कहना चाहती हूँ। प्रभो! इस दासीकी बात सुनो। मेरे प्राण चिन्तासे निरन्तर जल रहे हैं, चित्त चञ्चल हो रहा है। तुम्हारी ओर देखते समय मैं पलभरके लिये आँख बंद करने या पलक मारनेमें भी असमर्थ हो जाती हूँ। फिर प्राणनाथ! तुम्हारे बिना भूतलपर अकेली कैसे जाऊँगी? प्राणेश्वर! जीवनबन्धो! सच बताओ, वहाँ गोकुलमें कितने कालके पश्चात् तुम्हारे साथ मेरा अवश्य मिलन होगा। तुम्हें देखे बिना एक निमेष भी मेरे लिये सौ युगोंके समान प्रतीत होगा। वहाँ मैं किसे देखूँगी? कहाँ जाऊँगी? और कौन मेरी रक्षा करेगा? प्राणेश! तुम्हारे सिवा दूसरे किसी पिता, माता, भाई, बन्धु, बहिन अथवा पुत्रका मैं क्षणभर भी चिन्तन नहीं करती हूँ। मायापते! यदि तुम भूतलपर मुझे भेजकर मायासे आच्छन्न कर देना चाहते हो, वैभव देकर भुलाना चाहते हो तो मेरे समक्ष सच्ची प्रतिज्ञा करो। मधुसूदन! मेरा मनरूपी मधुप तुम्हारे मकरन्दयुक्त चरणारविन्दमें ही नित्य-निरन्तर भ्रमण करता रहे। जहाँ-जहाँ जिस योनिमें भी मेरा यह जन्म हो, वहाँ-वहाँ तुम मुझे अपना स्मरण एवं मनोवाञ्छित दास्यभाव प्रदान करोगे। मैं भूतलपर कभी भी इस बातको न भूलूँ कि तुम मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण हो, मैं