ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें४४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
उपकार, वाराणसीपुरीका दहन, महादेवजीको
जृम्भणास्त्रसे बाँधना, बाणासुरकी भुजाओंको काटना,
पारिजातका अपहरण, अन्यान्य कर्मोंका सम्पादन,
प्रभासतीर्थकी यात्रामें जाना, वहाँ मुनिमण्डलीका
दर्शन करना, ब्रजके बन्धुजनोंसे वार्तालाप, पिताके
यज्ञका सम्पादन, वहीं शुभ बेलामें पुनः तुम्हारे
साथ मिलन तथा गोपियोंका साक्षात्कार आदि
कार्य मुझे करने हैं। फिर तुम्हें अध्यात्मज्ञानका
उपदेश देकर वास्तवमें तुम्हारे साथ नित्य मिलनका
सौभाग्य प्राप्त करूँगा। इसके बाद मेरे साथ दिन-
रात तुम्हारा संयोग बना रहेगा। कभी क्षणभरके
लिये भी वियोग न होगा। इतना ही नहीं, वहाँसे
तुम्हारे साथ मेरा पुनः ब्रजमें आगमन होगा।
प्राणवल्लभे ! वियोगकालमें भी स्वप्नमें तुम्हारे साथ
मेरा सदैव मिलन होता रहेगा। तुमसे बिछुड़कर
द्वारकामें जानेपर मेरे और मेरे नारायणांशके द्वारा
उपर्युक्त कार्य सम्पादित होंगे। फिर वृन्दावनमें
तुम्हारे साथ मेरा निवास होगा। फिर माता-पिता
तथा गोपियोंके शोकका पूर्णतः निवारण होगा।
भूतलका भार उतारकर तुम्हारे और गोप-गोपियोंके
साथ मेरा पुनः गोलोकमें आगमन होगा। राधे !
मेरे अंशभूत जो नित्य परमात्मा नारायण हैं, वे
लक्ष्मी और सरस्वतीके साथ वैकुण्ठलोकको
पधारेंगे। धर्म और मेरे अंशोंका निवासस्थान
श्वेतद्वीपमें होगा। देवताओं और देवियोंके अंश
भी अक्षय धामको पधारेंगे। फिर इसी गोलोकमें
तुम्हारे साथ मेरा निवास होगा। कान्ते ! इस प्रकार
समस्त भावी शुभाशुभका वर्णन मैंने कर दिया।
मेरे द्वारा जो निश्चय हो चुका है, उसका कौन
निवारण कर सकता है?
तदनन्तर श्रीहरिने देवताओं और देवियोंसे
समयोचित बात कही—देवताओ ! अब तुमलोग
भावी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको
जाओ। पार्वति ! तुम अपने दोनों पुत्रों तथा
स्वामीके साथ कैलासको जाओ। मैंने जो कार्य
तुम्हारे जिम्मे लगाया है, वह सब यथासमय पूरा
होगा। ब्रजेश्वरि ! राधे ! गणेशजीको छोड़कर शेष
छोटे-बड़े सभी देवताओं और देवियोंका कलाद्वारा
भूतलपर अवतरण होगा।
तदनन्तर लक्ष्मी, सरस्वती तथा श्रीराधासहित
पुरुषोत्तम श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रणाम करके
सब देवता आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानको
चले गये। श्रीहरिने जिस कार्यका आयोजन किया
था, उसे सफल बनानेके लिये वे व्यग्रतापूर्वक
भूतलपर पधारे; क्योंकि स्वामीका बताया हुआ
स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ था।
श्रीकृष्णने राधासे कहा—प्रिये ! तुम
पूर्वनिश्चित गोप-गोपियोंके समुदायके साथ वृषभानुके
निवासगृहको पधारो। मैं मथुरापुरीमें वसुदेवके
घर जाऊँगा। फिर कंसके भयका बहाना बनाकर
गोकुलमें तुम्हारे समीप आ जाऊँगा।
लाल कमलके समान नेत्रोंवाली श्रीराधा
श्रीकृष्णको प्रणाम करके प्रेमविच्छेदके भयसे
कातर हो उनके सामने फूट-फूटकर रोने लगीं।
वे ठहर-ठहरकर कभी कुछ दूरतक जातीं और
जा-जाकर बार-बार लौट आती थीं। लौटकर
पुनः श्रीहरिका मुँह निहारने लगती थीं। सती
राधा शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिसुधासे
पूर्ण प्रभुके मुखचन्द्रकी सौन्दर्य-माधुरीका अपने
निमेषरहित नेत्र-चकोरोंद्वारा पान करती थीं।
तदनन्तर परमेश्वरी राधा प्रभुकी सात बार परिक्रमा
करके सात बार प्रणाम करनेके अनन्तर पुनः
श्रीहरिके सामने खड़ी हुईं। इतनेमें ही करोड़ों
गोप-गोपियोंका समूह वहाँ आ पहुँचा। उन
सबके साथ श्रीराधाने पुनः श्रीकृष्णको प्रणाम
किया। तत्पश्चात् तैंतीस सखीस्वरूपा गोपकिशोरियों
और गोपसमूहोंके साथ सुन्दरी राधा श्रीहरिको
मस्तक झुकाकर भूतलके लिये प्रस्थित हुईं। वे
सब-के-सब श्रीहरिके बताये हुए स्थान नन्द-
गोकुलको गये। फिर राधा वृषभानुके घरमें और