भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 461

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४५१ मकराकृति कुण्डल झलमला रहे थे। मुख मन्द हास्यकी छटासे प्रसन्न जान पड़ता था। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर-से दिखायी पड़ते थे। श्रेष्ठ मणि-रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित आभूषण उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। पीताम्बरसे सुशोभित श्रीविग्रहकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम थी। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमके द्रवसे निर्मित अङ्गराग सब अङ्गोंमें लगा हुआ था। उनका मुखचन्द्र शरत्पूर्णिमाके शशधरकी शुभ्र ज्योत्स्नाको तिरस्कृत कर रहा था। बिम्बफलके सदृश लाल अधरके कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गयी थी। माथेपर मोरपंखके मुकुट तथा उत्तम रत्नमय किरीटसे श्रीहरिकी दिव्य ज्योति और भी जाज्वल्यमान हो उठी थी। टेढ़ी कमर, त्रिभङ्गी झाँकी, वनमालाका शृङ्गार, वक्षमें श्रीवत्सकी स्वर्णमयी रेखा और उसपर मनोहर कौस्तुभमणिकी भव्य प्रभा अद्भुत शोभा दे रही थी। उनकी किशोर अवस्था थी। वे शान्तस्वरूप भगवान् श्रीहरि ब्रह्मा और महादेवजीके भी परम कान्त (प्राणवल्लभ) हैं। मुने! वसुदेव और देवकीने उन्हें अपने समक्ष देखा। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। वसुदेवजीने अपनी पत्नी देवकीके साथ अश्रुपूर्णनयन, पुलकितशरीर तथा नतमस्तक हो हाथ जोड़ भक्तिभावसे उनकी स्तुति की। वसुदेवजी बोले—भगवन्! आप श्रीमान् (सहज शोभासे सम्पन्न), इन्द्रियातीत, अविनाशी, निर्गुण, सर्वव्यापी, ध्यानसे भी किसीके वशमें न होनेवाले, सबके ईश्वर और परमात्मा हैं। स्वेच्छामय, सर्वस्वरूप, स्वच्छन्द रूपधारी, अत्यन्त निर्लिप्त, परब्रह्म तथा सनातन बीजरूप हैं। आप स्थूलसे भी अत्यन्त स्थूल, सर्वत्र व्याप्त, अतिशय सूक्ष्म, दृष्टिपथमें न आनेवाले, समस्त शरीरोंमें साक्षीरूपसे स्थित तथा अदृश्य हैं। साकार, निराकार; सगुण, गुणोंके समूह; प्रकृति, प्रकृतिके शासक तथा प्राकृत पदार्थोंमें व्याप्त होते हुए भी प्रकृतिसे परे विद्यमान हैं। विभो! आप सर्वेश्वर, सर्वरूप, सर्वान्तक, अविनाशी, सर्वाधार, निराधार और निर्व्यूह (तर्कके अविषय) हैं; मैं आपकी क्या स्तुति करूँ? भगवान् अनन्त (सहस्रों जिह्वावाले शेषनाग) भी आपका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं। सरस्वतीदेवीमें भी वह शक्ति नहीं कि आपकी स्तुति कर सकें। पञ्चमुख महादेव और छः मुखवाले स्कन्द भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकते, वेदोंको प्रकट करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा भी जिनके स्तवनमें सर्वदा अक्षम हैं तथा योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु गणेश भी जिनकी स्तुतिमें असमर्थ हैं; उन आपका स्तवन ऋषि, देवता, मुनीन्द्र, मनु और मानव कैसे कर सकते हैं? उनकी दृष्टिमें तो आप कभी आये ही नहीं हैं। जब श्रुतियाँ आपकी स्तुति नहीं कर सकतीं तो विद्वान् लोग क्या कर सकते हैं? मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि आप ऐसे दिव्य शरीरको त्यागकर बालकका रूप धारण कर लें। जो मनुष्य वसुदेवजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी दास्य-भक्ति प्राप्त कर