भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 460

४५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तर्ककी पहुँच नहीं होती है। आप सबके आधार हैं। शङ्का और उपद्रवसे शून्य हैं। उपाधिशून्य, निर्लिप्त और निरीह हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं। अपनी आत्मामें रमण करनेवाले पूर्णकाम, निर्दोष और नित्य हैं। आप सौभाग्यशाली और दुर्भाग्यरहित हैं तथा प्रवचनकुशल हैं। आपको रिझाना या लाँघना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आपके निःश्वाससे वेदोंका प्राकट्य हुआ है; इसलिये आप उनके प्रादुर्भावमें हेतु हैं। सम्पूर्ण वेद आपके स्वरूप हैं। छन्द आदि वेदाङ्ग भी आपसे भिन्न नहीं हैं। आप वेदवेत्ता और सर्वव्यापी हैं। ऐसा कहकर देवताओंने बारंबार उनको प्रणाम किया। उन सबके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक रहे थे। उन सबने फूलोंकी वर्षा की। जो पुरुष प्रातःकाल उठकर (मूल श्लोकमें कहे गये) बयालीस नामोंका पाठ करता है, वह श्रीहरिकी दृढ़भक्ति, दास्यभाव तथा मनोवाञ्छित फल पाता है*। भगवान् नारायण कहते हैं - इस प्रकार स्तुति सुनाकर देवतालोग अपने-अपने धामको चले गये। फिर जलकी वृष्टि होने लगी। सारी मथुरा नगरी निश्चेष्ट होकर सो रही थी। मुने ! वह रात्रि घोर अन्धकारसे व्यास थी। जब रातके सात मुहूर्त निकल गये और आठवाँ उपस्थित हुआ, तब आधी रातके समय सर्वोत्कृष्ट शुभ लग्न आया। वह वेदोंसे अतिरिक्त तथा दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय लग्न था। उस लग्नपर केवल शुभ ग्रहोंकी दृष्टि थी। अशुभ ग्रहोंकी नहीं थी। रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथिके संयोगसे जयन्ती नामक योग सम्पन्न हो गया था। मुने ! जब अर्धचन्द्रमाका उदय हुआ, उस समय लग्नकी ओर देख-देखकर भयभीत हुए सूर्य आदि सभी ग्रह आकाशमें अपनी गतिके क्रमको लाँघकर मीन लग्नमें जा पहुँचे। शुभ और अशुभ सभी वहाँ एकत्र हो गये। विधाताकी आज्ञासे एक मुहूर्तके लिये वे सभी ग्रह प्रसन्नतापूर्वक ग्यारहवें स्थानमें जाकर वहाँ सानन्द स्थित हो गये। मेघ वर्षा करने लगे। ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी। पृथ्वी अत्यन्त प्रसन्न थी। दसों दिशाएँ स्वच्छ हो गयी थीं। ऋषि, मनु, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, देवता और देवियाँ सभी प्रसन्न थे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वराज और विद्याधरियाँ गीत गाने लगीं। नदियाँ सुखपूर्वक बहने लगीं। अग्निहोत्रकी अग्नयाँ प्रसन्नतापूर्वक प्रज्वलित हो उठीं। स्वर्गमें दुन्दुभियों और आनकोंकी मनोहर ध्वनि होने लगी। खिले हुए पारिजातके पुष्पोंकी झड़ी लग गयी। पृथ्वी नारीका रूप धारण करके स्वयं सूतिकागारमें गयी। वहाँ जय- जयकार, शङ्खनाद तथा हरिकीर्तनका शब्द गूँज रहा था। इसी समय सती देवकी वहाँ गिर पड़ीं। उनके पेटसे वायु निकल गयी और वहीं भगवान् श्रीकृष्ण दिव्यस्वरूप धारण करके देवकीके हृदयकमलके कोशसे प्रकट हो गये। उनका शरीर अत्यन्त कमनीय और परम मनोहर था। दो भुजाएँ थीं। हाथमें मुरली शोभा पा रही थी। कानोंमें

  • देवा ऊचुः - जगद्योनिरयोनिस्त्वमनन्तोऽव्यय एव च । ज्योतिःस्वरूपो ह्यनघः सगुणो निर्गुणो महान् ॥ भक्तानुरोधात् साकारो निराकारो निरंकुशः । स्वेच्छामयश्च सर्वेशः सर्वः सर्वगुणाश्रयः ॥ सुखदो दुःखदो दुर्गो दुर्जनान्तक एव च । निर्व्यूहो निखिलाधारो निःशङ्को निरुपद्रवः ॥ निरुपाधिश्च निर्लिप्तो निरीहो निधनान्तकः । आत्मारामः पूर्णकामो निर्दोषो नित्य एव च ॥ सुभगो दुर्भगो वाग्मी दुराराध्यो दुरत्ययः । वेदहेतुश्च वेदाश्च वेदाङ्गो वेदविद् विभुः ॥ इत्येवमुक्त्वा देवाश्च प्रणेमुश्च मुहुर्मुहुः । हर्षाश्रुलोचनाः सर्वे ववृषुः कुसुमानि च ॥ द्विचत्वारिंशन्नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् । दृढां भक्तिं हरेर्दास्यं लभते वाञ्छितं फलम् ॥ ( श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७। ५५-६१)