ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४४९ वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजा कंसने बहिनको छोड़ दिया। वसुदेवजी प्यारी पत्नीको साथ लेकर अपने घर गये। नारद ! देवकीके गर्भसे क्रमशः जो छः संतानें हुईं, उन्हें वसुदेवजीने कंसको दे दिया; क्योंकि वे सत्यसे बँधे हुए थे। कंसने क्रमशः उन सबको मार डाला। देवकीके सातवें गर्भके आनेपर कंसने भयके कारण उसकी रक्षाकी ओर विशेष ध्यान दिया। परंतु योगमायाने उस गर्भको खींचकर रोहिणीके पेटमें रख दिया। रक्षकोंने राजाको यह सूचना दी कि देवकीका सातवाँ गर्भ गिर गया। उसी गर्भसे भगवान् अनन्त प्रकट हुए, जो 'संकर्षण' नामसे प्रसिद्ध हुए। तदनन्तर देवकीका आठवाँ गर्भ प्रकट हुआ जो वायुसे भरा हुआ था। नवाँ मास व्यतीत होनेके पश्चात् दसवाँ मास उपस्थित होनेपर सर्वदर्शी भगवान्ने उस गर्भपर दृष्टिपात किया। समस्त नारियोंमें श्रेष्ठ देवी देवकी स्वयं तो रूपवती थीं ही, भगवान्के दृष्टिपात करनेपर तत्काल ही उनका सौन्दर्य चौगुना बढ़ गया। कंसने देखा, देवकीके मुख और नेत्र खिल उठे हैं। वह तेजसे प्रज्वलित हो योगमायाके समान दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रही है; मूर्तिमान् ज्योतिःपुञ्ज-सी दिखायी देती है। उसे देख असुरराज कंसको बड़ा विस्मय हुआ। उसने मन-ही-मन कहा- 'इस गर्भसे जो संतान होगी, वही मेरी मृत्युका कारण है' - ऐसा कहकर कंस यत्नपूर्वक देवकी और वसुदेवकी रखवाली करने लगा। उसने सात द्वारवाले भवनमें उन दोनोंको रख छोड़ा था। दसवें मासके पूर्ण होनेपर जब वह गर्भ वायुसे पूर्ण हो गया। तब सबसे निर्लिप्त रहनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने देवकीके हृदय-कमलमें निवास किया। उस समय महामनस्वी वसुदेवने देवकीपर दृष्टिपात करके समझ लिया कि प्रसवकाल सन्निकट आ गया है। फिर तो वे भगवान् श्रीहरिका स्मरण करने लगे। रत्नमय प्रदीपसे युक्त उस परम मनोहर भवनमें उन्होंने तलवार, लोहा, जल और अग्निको लाकर रखा। मन्त्रज्ञ मनुष्य तथा भाई-बन्धुओंकी स्त्रियोंको भी बुला लिया। भयसे व्याकुल वसुदेवने विद्वान् ब्राह्मण तथा बन्धुओंको भी सादर बुला भेजा। इसी समय जब रातके दो पहर बीत गये, आकाशमें बादल घिर आये, बिजलियाँ चमकने लगीं, अनुकूल वायु चलने लगी तथा रक्षक निद्रित हो शय्यापर इस तरह निश्चेष्ट सो गये, मानो मरकर अचेत हो गये हों; तब धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगण वहाँ आये तथा गर्भस्थ परमेश्वरकी स्तुति करने लगे। देवता बोले- भगवन् ! आप समस्त संसारकी उत्पत्तिके स्थान हैं, किंतु आपकी उत्पत्तिका स्थान कोई नहीं है। आप अनन्त, अविनाशी, निष्पाप, सगुण, निर्गुण तथा महान् ज्योतिःस्वरूप हैं। आप निराकार होते हुए भी भक्तोंके अनुरोधसे साकार बन जाते हैं। आपपर किसीका अंकुश या नियन्त्रण नहीं है। आप सर्वथा स्वच्छन्द, सर्वेश्वर, सर्वरूप तथा समस्त गुणोंके आश्रय हैं। आप संतोंको सुख देनेवाले, दुष्टोंको दुःख प्रदान करनेवाले, दुर्गमस्वरूप एवं दुर्जनोंके नाशक हैं। आपतक