भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

४४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण सहस्रों स्वर्णपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों सुन्दरी दासियाँ, नाना प्रकारके द्रव्य, भाँति- भाँतिके रत्न, उत्तम मणि, हीरे तथा रत्नमय पात्र दिये थे। देवककी कन्या श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित, सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती, त्रिभुवनमोहिनी, धन्य, मान्य तथा श्रेष्ठ युवती थी। रूप और गुणकी निधि थी। उसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी रहती थी। उसे रथपर बिठाकर वसुदेव जब प्रस्थान करने लगे, तब बहिनके विवाहमें हर्षसे भरा हुआ कंस भी उसके साथ चला। वह तत्काल देवकीके रथके निकट आ गया। इसी समय कंसको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—'राजेन्द्र! क्यों हर्षसे फूल उठे हो? यह सच्ची बात सुनो। देवकीका आठवाँ गर्भ तुम्हारी मृत्युका कारण होगा।' यह सुनकर महाबली कंसने हाथमें तलवार ले ली। दैवी वाणीपर विश्वास करके भयभीत और कुपित हो वह महापापी नरेश देवकीका वध करनेके लिये उद्यत हो गया। वसुदेवजी बड़े भारी पण्डित, नीतिज्ञ तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थे। उन्होंने कंसको देवकीका वध करनेके लिये उद्यत देख उसे समझाना आरम्भ किया। वसुदेवजी बोले- राजन् ! जान पड़ता है तुम राजनीति नहीं जानते हो। मेरी बात सुनो। यह तुम्हारे लिये हितकर और यशस्कर है। साथ ही कलङ्कको दूर करनेवाली, शास्त्रोंद्वारा प्रतिपादित तथा समयके अनुरूप भी है। भूपाल ! यदि इसके आठवें गर्भसे ही तुम्हारी मृत्यु होनेवाली है तो इस बेचारीका वध करके क्यों अपयश लेते और अपने लिये नरकका मार्ग प्रशस्त करते हो ? जीवमात्रके वधसे ही न्यूनाधिक पाप होता है; परंतु ब्रह्महत्या बहुत बड़ा पातक है। स्त्रीका वध करनेसे मनुष्यको ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है। विशेषतः यह तुम्हारी बहिन है। तुमसे पालित और पोषित होने योग्य है तथा तुम्हारी शरणमें आयी है। नरेश्वर ! इसका वध करनेपर तुम्हें सौ स्त्रियोंकी हत्याका पाप लगेगा। मनुष्य जप, तप, दान, पूजा, तीर्थदर्शन, ब्राह्मणभोजन और होमयज्ञ आदिका अनुष्ठान स्वर्ग (दिव्य सुख)-की प्राप्तिके लिये ही करता है। साधुपुरुष समस्त संसारको पानीके बुलबुले और स्वप्नकी भाँति निःसार एवं मिथ्या मानते और भयदायक समझते हैं। इसीलिये वे सदैव यत्नपूर्वक धर्मका अनुष्ठान करते हैं। यदुकुल-कमल-दिवाकर धर्मिष्ठ नरेश्वर ! अपनी इस बहिनको छोड़ दो; मारो मत। तुम्हारी राजसभामें कई प्रकारके विद्वान् हैं। तुम उन सबसे पूछो कि इसके विषयमें क्या करना चाहिये ? भाई ! इसके आठवें गर्भमें जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे हाथमें दे दूँगा। उससे मेरा क्या प्रयोजन है? अथवा ज्ञानिशिरोमणे ! जितनी भी संतानें होंगी, उन सबको मैं तुम्हारे हवाले कर दूँगा; क्योंकि उनमेंसे एक भी मुझे तुमसे अधिक प्रिय नहीं है। राजेन्द्र ! बहिनको जीवित छोड़ दो। यह तुम्हें बेटीके समान प्यारी है। तुमने इस छोटी बहिनको सदा मीठे अन्न-पान देकर पाल- पोसकर बड़ा किया है।